#अनोखा_भाई !

निरालाजी का नाम निराला यूँ ही नहीं था बल्कि वे वास्तव में ही निराले थे. रूखे रूखे बाल बिखरे रहते. न कभी उन्हें संवारना न तेल आदि डालना. . किसी ने उन्हें सुगन्धित तेल दिया और कहा, “पंडितजी ! ये आपके लिए एक साल तक काफी रहेगा. ख़त्म हो जाये तो बता देना. निरालाजी न शीशी खोली और सारा तेल अपने सिर पर उड़ेल लिया. तेल उनकी दाढ़ी पर से सैर करता हुआ उनके सिलवटी वस्त्रों पर और वे ठहाका लगा कर बोले, “भैय्या ! ई तो ख़त्म. दुई-चार और ले आवो!” ऐसे फक्कड़ थे निरालाजी !

सत्य पथ

Nirala

महादेवी वर्मा को जब ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था तो एक साक्षात्कार के दौरान उनसे पूछा गया था, “आप इस एक लाख रुपये का क्या करेंगी?”

महादेवी जी ने कहा , “न तो मैं अब कोई कीमती साड़ियाँ पहनती हूँ , न कोई सिंगार-पटार कर करती हूँ. ये लाख रुपये पहले मिल गए होते तो भाई को चिकित्सा और दवा के अभाव में यूँ न जाने देती.” कहते-कहते उनका दिल भर आया.

कौन था उनका वो भाई? हिंदी के युग-प्रवर्तक औघड़-फक्कड़-महाकवि पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी के मुंहबोले भाई थे।

एक बार वे रक्षा-बंधन के दिन सुबह-सुबह जा पहुंचे अपनी लाडली बहन के घर और रिक्शा रुकवाकर चिल्लाकर द्वार से ही बोले, “दीदी, जरा बारह रुपय्ये तो लेकर आना।”

महादेवी रुपये तो तत्काल ले आई मगर पूछा, “यह तो बताओ भैय्या ! यह सुबह-सुबह आज बारह रुपये की क्या जरूरत आन पड़ी?” हालाँकि उनकी प्यारी दीदी जानती थी…

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#अनोखा_भाई !

#अनोखा_भाई !

Source: #अनोखा_भाई !

निरालाजी का नाम निराला यूँ ही नहीं था बल्कि वे वास्तव में ही निराले थे. रूखे रूखे बाल बिखरे रहते. न कभी उन्हें संवारना न तेल आदि डालना. . किसी ने उन्हें सुगन्धित तेल दिया और कहा, “पंडितजी ! ये आपके लिए एक साल तक काफी रहेगा. ख़त्म हो जाये तो बता देना. निरालाजी न शीशी खोली और सारा तेल अपने सिर पर उड़ेल लिया. तेल उनकी दाढ़ी पर से सैर करता हुआ उनके सिलवटी वस्त्रों पर और वे ठहाका लगा कर बोले, “भैय्या ! ई तो ख़त्म. दुई-चार और ले आवो!” ऐसे फक्कड़ थे निरालाजी !

#अनोखा_भाई !

#अनोखा_भाई !

 

Nirala

महादेवी वर्मा को जब ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था तो एक साक्षात्कार के दौरान उनसे पूछा गया था, “आप इस एक लाख रुपये का क्या करेंगी?”

महादेवी जी ने कहा , “न तो मैं अब कोई कीमती साड़ियाँ पहनती हूँ , न कोई सिंगार-पटार कर करती हूँ. ये लाख रुपये पहले मिल गए होते तो भाई को चिकित्सा और दवा के अभाव में यूँ न जाने देती.” कहते-कहते उनका दिल भर आया.

कौन था उनका वो भाई? हिंदी के युग-प्रवर्तक औघड़-फक्कड़-महाकवि पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी के मुंहबोले भाई थे।

एक बार वे रक्षा-बंधन के दिन सुबह-सुबह जा पहुंचे अपनी लाडली बहन के घर और रिक्शा रुकवाकर चिल्लाकर द्वार से ही बोले, “दीदी, जरा बारह रुपय्ये तो लेकर आना।”

महादेवी रुपये तो तत्काल ले आई मगर पूछा, “यह तो बताओ भैय्या ! यह सुबह-सुबह आज बारह रुपये की क्या जरूरत आन पड़ी?” हालाँकि उनकी प्यारी दीदी जानती थी कि उनका यह दानवीर भाई रोजाना ही किसी न किसी को अपना सर्वस्व दान कर आ जाता है, पर आज तो रक्षा-बंधन है, आज क्यों?

निरालाजी सरलता से बोले, “ये दुई रुपय्या तो इस रिक्शा वाले के लिए और दस रुपय्ये तुम्हें देना है। आज राखी है ना! तुम्हें भी तो राखी बँधवाई के पैसे देने होंगे।”

ऐसे थे फक्कड़ निराला और ऐसी थी उनकी वह स्नेहमयी ‘दीदी’।

#अनोखा_भाई !

मी लाॅड ,यह कविता नहीं मेरी गवाही है !

Pandits Of J&K

मी लाॅड ,यह कविता नहीं मेरी गवाही है !

(सुप्रीम कोर्ट के हालिया अफसोसनाक फैसले से व्याकुल कवि दिलीप कुमार कौल की यह कविता कई ज़रूरी सवाल उठाती है । यह तर्क देकर कि 27 बरस पुराने हो चुके लाखों कश्मीरी पंडितों के देश निकाले, उनके उत्पीड़न और उनकी हत्याओं की जाँच अब नहीं की जा सकती, सुप्रीम कोर्ट ने ‘डिनायल आॅफ जीनोसाइड ‘ (Denial of Genocide) सरीखा निर्णय देकर न्याय प्रदान करने की एकतरह से समय सीमा बांधी है । इसके दूरगामी प्रभाव होंगे। न्याय की गुहार लगाने वाले भारतीय नागरिकों पर -अग्निशेखर )

## मित्र और कवि / लेखक / चिन्तक अग्निशेखर जी की वाल से साभार

मी लाॅड, यह कविता नहीं मेरी गवाही है !

-दिलीप कुमार कौल

“हत्यारे गदगद हैं

और हताहतों की आत्माएं

भटकने को अभिशप्त”,

यह बुझी हुई सी आवाज़

किसी की भी हो सकती थी

लेकिन न्यायमूर्ति ने मेरी ओर उंगली उठाकर कहा,

“जो कुछ कहना है

कटघरे में आकर कहो…”

यह फैसले के बाद की सांत्वना थी

या अदालत की सामान्य कार्रवाई?

जो भी था

मैं तो भीड़ में से

यों ही चुन लिया गया था

कुछ ही क्षण पहले

फैसला आ चुका था

कि सत्ताईस बरस गुज़र जाएं

तो चुन चुन कर की गई हत्याएं

सामान्य सी मौतों में बदल जाती हैं

बरसों की धूल में

सबूत दब जाते हैं

और अंत्येष्ठियों की यात्राओं से

थक कर टूट जाती हैं गवाहियां….

मी लॉर्ड!

आपने तो हमसे भी प्राचीन हत्याओं के सबूत

फूंक फूंक कर निकाले हैं

वक्त की गहराइयों में से

यहां तक कि विवादों को ख़त्म करने के लिये

सदियों पुराने विवादास्पद ढांचों की

नींव तक खुदवा दी…

*,^/“देखो तुम कटघरे में नहीं आए तो

अदालत की

अवमानना के दोषी हो सकते हो…”

मी लॉर्ड!

मैं जहां से बोल रहा हूं

वहां भी कटघरे में ही हूं

मैं मानता हूं कि मैं ही दोषी हूं

श्राद्धों और तर्पणों की भीड़ से भरे

इन सत्ताइस बरसों में

मैं तो भूल ही गया था

हत्यारों को

जिन्होंने फेंक दिया था

आग बरसाते सूरज के नीचे

उन मेरे अपनों को

जो जन्म से ही

शीतल हवाओं के आदी रहे थे

ज़िन्दगी जीने की कोशिश में

उनके भीतर का पानी

निचुड़ता चला गया

वे मरते चले गये हज़ारों की तादाद में

और उन्हें गिनते हुये

मैं सोचता रहा कि

यह संहार

कितनी देर तक बहता रहेगा मेरी रग रग में!

यह आख़िरी अदालत थी, मी लॉर्ड!

जो सबूतों के लिये

पुरातात्त्विक उत्खनन करवाने के लिये

मशहूर थी

पर मेरी हत्याओं के लिये

कुछ बरसों की धूल झाड़ने में

असमर्थ थी

मी लॉर्ड!

वैज्ञानिक प्रमाण ही आपको

असमर्थता से

उबार सकते हैं

मैं कोई भी यातना सहने के लिये तैयार हूं

विद्युत आवेश से

उत्तेजित करवाइये

मेरी स्नायु कोशिकाओं को

निकाल लाइये मेरे भीतर से

हत्याओं की गवाहियां

विद्युत आवेश के प्रवाह के साथ ही

हर हत्याओं का मातम

आंखों में उतर आएगा

“शिव शिव शम्भो” के असंख्य उच्चारण

जीभ पर उतर आएंगे

गूंज उठेंगे हत्यारों के नाम

मेरे अपनों के वे हज़ारों हाथ

छटपटाकर चारों ओर फैल जाएंगे

जो सदियों तक

सुबह नींद खुलते ही

आंखों के आगे आ जाते थे

और

“कराग्रे वसते लक्ष्मी, करमध्ये सरस्वती

के उच्चारण के साथ

आंखों को सहलाते थे

वो हज़ारों आंखें और हाथ

मेरी नींद में तैरते हैं

‘ ‘ और जागरण में भी

हत्यारों के हाथ तो

राजकीय आदर-सत्कार से

इतने नर्म हो चुके हैं कि

टेलिविजन स्क्रीन पर भी

उनकी कोमलता

साफ़ दिखाई देती है।

“तुम कविता करने आये हो या

गवाही देने?”

न्यायमूर्ति क्षुब्ध हैं

“मी लॉर्ड

यह कविता नहीं मेरी गवाही है

और सबूत के तौर पर

मेरे पास

कविता के सिवा

कुछ नहीं है।

##

(29 जुलाई 2017)

 

मी लाॅड ,यह कविता नहीं मेरी गवाही है !

भगवानजी की व्यथा 

और इसी कारण आज तक मानव ईश्वर के दर्शन न कर सका. उसकी खोज में कहाँ कहाँ नहीं भटकता है इंसान मगर सिर्फ अपने दिल में ही नहीं पहुँच पाता. और जिसने अन्दर की यात्रा की उसने उसको पा लिया.

सत्य पथ

death-1भगवान
इंसान का निर्माण कर 
बहुत ही सकपकाया, 
सुबह शाम
रात दिन
अपने दर पर
उसे खड़े देख कर
सिर उसका चकराया
और
वो तो बहुत ही घबराया.
कोई रास्ता न पा
उसने अपने पार्षदों की
सभा बुलाई
और
उन्हें अपनी
व्यथा-कथा सुनाई. 

और पूछा,
“आखिर मनुष्य से पीछा
कैसे छुड़ाया जाये?
छोटे बड़े बूढ़े जवान
सभी तो पीछे पड़ गए.
जबसे उसे बनाने की की है भूल
चैन की सांस न हम ले पाए.” 

सभासद सिर धुनते रहे
लेकिन कोई हल
न सुझा पाए.

आखिर
एक सभासद ने सुझाव दिया,
“आप माउंट एवरेस्ट पर
जाकर रहें, और चैन की बंसी बजाएं.
वहां मनुष्य तो क्या
परिंदा भी न पहुँच सकेगा,
कोई भी आपके सुख में
न खलल डाल सकेगा.”


भगवान
सभासद के भोलेपन पर हँसे,
“बोले
पता नहीं है तुम्हें भाई
तेनजिंग बहुत ज़ल्द ही
करेगा एवेरेस्ट पर चढ़ाई
और हमें वहां से भी
भागना पड़ेगा
और होगी जगहंसाई.” 

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भगवानजी की व्यथा 

भगवानजी की व्यथा 

Source: भगवानजी की व्यथा 

और इसी कारण आज तक मानव ईश्वर के दर्शन न कर सका. उसकी खोज में कहाँ कहाँ नहीं भटकता है इंसान मगर सिर्फ अपने दिल में ही नहीं पहुँच पाता. और जिसने अन्दर की यात्रा की उसने उसको पा लिया.

भगवानजी की व्यथा 

भगवानजी की व्यथा 

death-1
भगवान
इंसान का निर्माण कर 
बहुत ही सकपकाया, 
सुबह शाम
रात दिन
अपने दर पर
उसे खड़े देख कर
सिर उसका चकराया
और
वो तो बहुत ही घबराया.
कोई रास्ता न पा
उसने अपने पार्षदों की
सभा बुलाई
और
उन्हें अपनी
व्यथा-कथा सुनाई. 

और पूछा,
“आखिर मनुष्य से पीछा
कैसे छुड़ाया जाये?
छोटे बड़े बूढ़े जवान
सभी तो पीछे पड़ गए.
जबसे उसे बनाने की की है भूल
चैन की सांस न हम ले पाए.” 

सभासद सिर धुनते रहे
लेकिन कोई हल
न सुझा पाए.

आखिर
एक सभासद ने सुझाव दिया,
“आप माउंट एवरेस्ट पर
जाकर रहें, और चैन की बंसी बजाएं.
वहां मनुष्य तो क्या
परिंदा भी न पहुँच सकेगा,
कोई भी आपके सुख में
न खलल डाल सकेगा.”


भगवान
सभासद के भोलेपन पर हँसे,
“बोले
पता नहीं है तुम्हें भाई
तेनजिंग बहुत ज़ल्द ही
करेगा एवेरेस्ट पर चढ़ाई
और हमें वहां से भी
भागना पड़ेगा
और होगी जगहंसाई.” 


चन्द्रदेव
सभासद के सुझाव पर
मन ही मन मुस्काये
वे आगे आये और सुझाव दिया,
“आप मुझ पर आकर रहें
और निश्चिन्त हो जाएँ.”


चंद्रदेव की अज्ञानता पर
भगवानजी खूब हँसे
बोले,
“तुम भी खूब फंसे
तुम्हें पता नहीं
यूरि गागारिन ज़ल्द ही
तुम पर भी चढ़ाई करेगा
और
हमें वहां से भी
भागना पड़ेगा.” 


वरुणदेव ने
जल में रहने की युक्ति सुझाई
मगर
भगवानजी को
वह भी समझ में न आई.

अंत में
एक बूढ़े पार्षद ने
बहुमूल्य सुझाव दिया
“प्रभु !
आप जहाँ भी जायेंगे
इंसान से न बच पायेंगे
सिर्फ एक जगह है
जहाँ न वह पहुँच सकेगा
और आपको न कभी भी
ढूंढ सकेगा.
आप उसी के ह्रदय को
अपना निवास बना लें
और फिर
चैन की सांस लें
क्योंकि
वह आपको ढूँढने को
दर-दर की ख़ाक छानेगा
मंदिर-मस्जिद गिरजे गुरूद्वारे
में भटकेगा
मगर
अपने अन्दर ही न कभी
झाँक सकेगा,
और आपको न कभी भी
ढूंढ सकेगा.”
*********************************************************डॉ भरद्वाज क्षजान

भगवानजी की व्यथा