जीवन क्या है? आप जीवन किस को नज़रिए से देखते हो मित्रो? कुछ तो बोलो. जीवन तो आप भी जी रहे हो. आपको भी सीधा अनुभव है. तो अपनी भी सुनाओ ना ! मित्रों से क्या संकोच……

Source: जीवन क्या है?

जीवन क्या है? आप जीवन किस को नज़रिए से देखते हो मित्रो? कुछ तो बोलो. जीवन तो आप भी जी रहे हो. आपको भी सीधा अनुभव है. तो अपनी भी सुनाओ ना ! मित्रों से क्या संकोच……

जीवन क्या है?

Jiwan 1

जीवन क्या है?
विलियम शेक्सपियर (William Shakespeare) ने कहा था कि जिंदगी एक रंगमंच है और हम लोग इस रंगमंच के कलाकार | सभी लोग जीवन (Life) को अपने- अपने नजरिये से देखते है| कोई कहता है जीवन एक खेल है (Life is a game), कोई कहता है जीवन ईश्वर का दिया हुआ उपहार है (Life is a gift), कोई कहता है जीवन एक यात्रा है (Life is a journey), कोई कहता है जीवन एक दौड़ है (Life is a race) और बहुत कुछ| और हम कहते हैं की जीवन ब्रह्म है जिसके बिना हम शव मात्र हैं………..

जीवन क्या है?

महात्मा गाँधीगांधीजी को अपने आदर्श बहुत ही प्रिय थे. कभी भी उनके प्रति कोताही नहीं बरती. उन्हें हमारी श्रद्धांजलि.

Source: महात्मा गाँधी

महात्मा गाँधीगांधीजी को अपने आदर्श बहुत ही प्रिय थे. कभी भी उनके प्रति कोताही नहीं बरती. उन्हें हमारी श्रद्धांजलि.

महात्मा गाँधी

Gandhi

 

साइमन कमीशन आया. वायसराय ने गांधीजी को हवाई ज़हाज़ से तुरंत पहुँचने के लिए कहा. फिर भी गांधी रेल की 3 श्रेणी से ही दिल्ली पहुंचे. साइमन कमीशन आदि को इंतज़ार करना पड़ा. इतने पक्के थे गांधी अपने आदर्शों के बारे में जिन्हें आज लुच्चा-टुच्चा भी कह देता है गांधी ने देश के लिए किया ही क्या है?

महात्मा गाँधी

वीरांगना किरणदेवी

बाई सा

अकबर की महानता का गुणगान तो कई इतिहासकारों ने किया है लेकिन अकबर की ओछी हरकतों का वर्णन बहुत कम इतिहासकारों ने किया है. 

अकबर अपने गंदे इरादों से प्रतिवर्ष दिल्ली में नौरोज का मेला आयोजित करवाता था जिसमें पुरुषों का प्रवेश निषेध था. अकबर इस मेले में महिला की वेष-भूषा में जाता था और जो महिला उसे मंत्र मुग्ध कर देती थी उसे दासियाँ छल कपटवश अकबर के सम्मुख ले जाती थी. एक दिन नौरोज के मेले में महाराणा प्रताप की भतीजी छोटे भाई महाराज शक्तिसिंह की पुत्री मेले की सजावट देखने के लिए आई जिनका नाम बाईसा 

था जिनका विवाह बीकानेर के राजकुमार पृथ्वीराज जी के साथ हुआ था.

बाईसा किरणदेवी की सुंदरता को देखकर अकबर अपने आप पर काबू नही रख पाया और उसने बिना सोचे समझे दासियों के माध्यम से धोखे से जनाना महल में बुला लिया. जैसे ही अकबर ने बाईसा किरणदेवी को स्पर्श करने की कोशिश की कि किरणदेवी ने कमर से कटार निकाली और अकबर को ऩीचे पटकर छाती पर पैर रखकर कटार गर्दन पर लगा दी और कहा, “नींच… नराधम तुझे पता नहीं मैं उन महाराणा प्रताप की भतीजी हुं जिनके नाम से तुझे नींद नहीं आती है. बोल तेरी आखिरी इच्छा क्या है?”

अकबर का खून सुख गया. कभी सोचा भी नहीं था कि भारत सम्राट अकबर आज एक राजपूत बाईसा के चरणों में होगा. अकबर बोला, “मुझे पहचानने में भूल हो गई. मुझे माफ कर दो देवी.”

तो किरण देवी ने कहा कि आज के बाद दिल्ली में नौरोज का मेला नहीं लगेगा और किसी भी नारी को परेशान नहीं करेगा. अकबर ने हाथ जोड़कर कहा, “आज के बाद कभी मेला नहीं लगेगा.” उस दिन के बाद कभी मेला नहीं लगा.

इस घटना का वर्णन गिरधर आसिया द्वारा रचित सगत रासो मे 632 पृष्ठ संख्या पर दिया गया है. बीकानेर संग्रहालय में लगी एक पेटिंग मे भी इस घटना को एक दोहे के माध्यम से बताया गया है :-

किरण सिंहणी सी चढी उर पर खींच कटार,

भीख मांगता प्राण की अकबर हाथ पसार.

धन्य है किरण बाईसा उनकी वीरता को कोटिशः प्रणाम !

आज वीरांगना लक्ष्मीबाई की पुण्यतिथि है. इस अवसर पर एक और वीरांगना को स्मरण करना समीचीन ही है.

वीरांगना किरणदेवी