राजनैतिक वायदे

राजनेता कितने झूठे वायदे करते हैं किसी से छिपा नहीं है…

सत्य पथ

राजनेता कितने झूठे वायदे करते हैं किसी से छिपा नहीं है…

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राजनैतिक वायदे

राजनैतिक वायदे

 

Politiciaan

कहा ग्रामीणों ने सिंचाई मंत्री से 

“जब वोट मांगने आये थे 

बड़े बड़े ढोल बजाए थे 

और कहा था आपने 

गाँव-गाँव खेत-खेत में 

दूंगा नहरें बिछा 

अब बताइये तो ज़रा 

आपके किये वायदों का 

आखिर क्या हुआ?”

मंत्रीजी बोले,

“क्या करूँ भाई?

बड़ी मुसीबत है आई, 

एक हाथ से पकड़ी है 

कुर्सी 

न जाने कौन कब छीन ले,

दुसरे से पकड़ी है 

पगड़ी

कौन कब उछाल दे?

इसीलिए मेरे भाइयो 

मेरे तो दोनों हाथ हैं भरे 

अब आप ही बताएं 

नहरें कैसे खुदें

और गाँव-गाँव में, खेत-खेत में 

पानी कैसे पहुंचे? 

राजनैतिक वायदे

भारतमाता का लाल “लालबहादुर शास्त्री”

हम उस समय सिर्फ 10 वर्ष के थे, मगर हमने भी हर मंगलवार को व्रत रख कर अपने माताजी-पिताजी का साथ दिया था.

सत्य पथ

Shastrijiसन 1965.

पाकिस्तान ने बिना किसी कारण के भारत पर आक्रमण कर दिया था. भारत के प्रधानमंत्री थे श्री लाल बहादुर शास्त्री. खादी में लिपटी ठिगनी क्षीण देह मगर हौंसला लौहपुरुष सा.

शास्त्रीजी ने एक क्षण गंवाए बिना ही अपनी सेनाओं को आक्रमणकारियों को मुँह-तोड़ ज़वाब देने का संकेत दे दिया. फिर क्या था? भारतीय सेनाएं चीतों की मानिंद दुश्मन पर टूट पड़ीं. दुश्मन के पाँव उखड़ने लगे.

भारतीय सेनाओं ने हाजी पीर दर्रे पर ही नहीं लाहोर पर भी कब्ज़ा कर वहां राष्ट्रीय तिरंगा फहरा दिया था. अन्न-संकट के कारण भारत अमरीका पर आश्रित था. मगर शास्त्रीजी ने अमरीका की भी नहीं सुनी और इस पर स्वयं एक दिन का व्रत रखते हुए अपने देशवासियों को साथ देने का आह्वाहन किया और पूरे देश ने मंगलवार का व्रत रखना शुरू कर दिया था.

हम उस समय सिर्फ 10 वर्ष के थे, मगर हमने भी हर मंगलवार को व्रत रख…

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भारतमाता का लाल “लालबहादुर शास्त्री”

भारतमाता का लाल “लालबहादुर शास्त्री”

Source: भारतमाता का लाल “लालबहादुर शास्त्री” 

हम उस समय सिर्फ 10 वर्ष के थे, मगर हमने भी हर मंगलवार को व्रत रख कर अपने माताजी-पिताजी का साथ दिया था.

भारतमाता का लाल “लालबहादुर शास्त्री”

भारतमाता का लाल “लालबहादुर शास्त्री”

Shastriji

सन 1965.

पाकिस्तान ने बिना किसी कारण के भारत पर आक्रमण कर दिया था. भारत के प्रधानमंत्री थे श्री लाल बहादुर शास्त्री. खादी में लिपटी ठिगनी क्षीण देह मगर हौंसला लौहपुरुष सा.

शास्त्रीजी ने एक क्षण गंवाए बिना ही अपनी सेनाओं को आक्रमणकारियों को मुँह-तोड़ ज़वाब देने का संकेत दे दिया. फिर क्या था? भारतीय सेनाएं चीतों की मानिंद दुश्मन पर टूट पड़ीं. दुश्मन के पाँव उखड़ने लगे.

भारतीय सेनाओं ने हाजी पीर दर्रे पर ही नहीं लाहोर पर भी कब्ज़ा कर वहां राष्ट्रीय तिरंगा फहरा दिया था. अन्न-संकट के कारण भारत अमरीका पर आश्रित था. मगर शास्त्रीजी ने अमरीका की भी नहीं सुनी और इस पर स्वयं एक दिन का व्रत रखते हुए अपने देशवासियों को साथ देने का आह्वाहन किया और पूरे देश ने मंगलवार का व्रत रखना शुरू कर दिया था.

हम उस समय सिर्फ 10 वर्ष के थे, मगर हमने भी हर मंगलवार को व्रत रख कर अपने माताजी-पिताजी का साथ दिया था.

फख्र होता था हमें जब अगले दिन प्रार्थना-सभा में प्राचार्य महोदय पूछते, “कल किस किस ने व्रत रखा?” हमारा हाथ सबसे पहले उठता था और प्राचार्य महोदय हमारी पीठ थपथपाते हुए अन्य छात्रों को भी व्रत रखने की याद दिला देते.

यु.एन.ओ के हस्तक्षेप पर शास्त्रीजी को विश्व-सम्मति का सम्मान करना ही था. रूस ने मध्यस्थता की. ईश्वर जाने क्या हुआ कि शास्त्रीजी मास्को से जीवित ही न लौट पाए. शत शत नमन उस वीर प्रधानमंत्री को.

भारतमाता का लाल “लालबहादुर शास्त्री”

नमक सत्याग्रह

ये थे गांधीजी जिनको आज की एक विशेष-पीढ़ी निरंतर कोसती रहती है.

सत्य पथ

नमक सत्याग्रह तो एक बहाना था. उद्देश्य तो और भी श्रेष्ठ था जिसका ज़िक्र गाँधीजी ने अपने प्रत्येक पड़ाव के बाद दिए भाषण में किया था मगर अँगरेज़ अंत तक गांधीजी की मंशा को समझ ही नहीं पाए.

ये श्रेष्ठ उद्देश्य था साम्प्रदायिक सद्भाव जिसमें गाँधीजी पूर्णतया सफल हुए. कूच के दौरान बापू ने कहा कि साम्प्रदायिक एकता न हो तो उनके लिए स्वराज का कोई अर्थ ही नहीं है. इससे प्रेरित होकर मुस्लिम “अली-बंधुओं” की अपील को ठुकराते और “शारदा एक्ट” पर अपनी नाराजगी भुलाते हुए इस यात्रा में शरीक हुए थे.

ये प्रथम अवसर था जब अँगरेज़ भारतीय मानस को समझने में विफल रहे थे. आज के कट्टर मुस्लिमों और हिन्दुओं दोनों को ये जान कर आश्चर्य होगा कि गांधीजी ने कूच से पहले ही अपनी गिरफ़्तारी की स्थिति में सत्याग्रह की बागडोर श्री अब्बास तैयबजी को सौपने का निश्चय कर लिया था. ये भी तय कर दिया…

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नमक सत्याग्रह