संबोधन

 

 

!Moon 2

चाँद !

तुम्हारी तारीफ में शायरों ने

बड़े बड़े कसीदे पढ़े हैं

मृगनयनियों के मुखड़े भी

तुम्हारी उपमाओं से जड़े हैं.

माना नववधुएँ भी तुम्हारा

दीदार पाकर ही जलपान करती हैं,

ईद भी तो तुम्हारे दर्शन

पाकर ही मानती है.

क्या इसीलिए तुम अपनी शान

पर इतराते फिरते हो?

शिव की जटाओं में हो सुशोभित

इसी से इठलाते फिरते हो?

एक बात तो बताओ

हम तुम्हारा एतबार करें तो कैसे करें?

जब हर दिन हर रात

चेहरा आप अपना बदला करें.

पूनम का चाँद माना

सोलह कलाओं से भरपूर होते हो,

मगर ये तो बताओ

अमावस्या की रात तुम कहाँ रहते हो?

डॉ भारद्वाज क्षजान    

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2 thoughts on “संबोधन

  1. प्रकृति से मोहित होकर प्रकृति से भी शिकवे करने से भी नहीं चुकता इंसान. मानव प्रवृति को दर्शाती ये लघु कविता होठों पर हलकी सी ही सही, मुस्कान भी ला देती है. आनंद लें.

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  2. Reblogged this on सत्य पथ and commented:

    प्रकृति से मोहित होकर प्रकृति से भी शिकवे करने से भी नहीं चुकता इंसान. मानव प्रवृति को दर्शाती ये लघु कविता होठों पर हलकी सी ही सही, मुस्कान भी ला देती है. आनंद लें.

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