#अनोखा_भाई !

 

Nirala

महादेवी वर्मा को जब ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था तो एक साक्षात्कार के दौरान उनसे पूछा गया था, “आप इस एक लाख रुपये का क्या करेंगी?”

महादेवी जी ने कहा , “न तो मैं अब कोई कीमती साड़ियाँ पहनती हूँ , न कोई सिंगार-पटार कर करती हूँ. ये लाख रुपये पहले मिल गए होते तो भाई को चिकित्सा और दवा के अभाव में यूँ न जाने देती.” कहते-कहते उनका दिल भर आया.

कौन था उनका वो भाई? हिंदी के युग-प्रवर्तक औघड़-फक्कड़-महाकवि पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, महादेवी के मुंहबोले भाई थे।

एक बार वे रक्षा-बंधन के दिन सुबह-सुबह जा पहुंचे अपनी लाडली बहन के घर और रिक्शा रुकवाकर चिल्लाकर द्वार से ही बोले, “दीदी, जरा बारह रुपय्ये तो लेकर आना।”

महादेवी रुपये तो तत्काल ले आई मगर पूछा, “यह तो बताओ भैय्या ! यह सुबह-सुबह आज बारह रुपये की क्या जरूरत आन पड़ी?” हालाँकि उनकी प्यारी दीदी जानती थी कि उनका यह दानवीर भाई रोजाना ही किसी न किसी को अपना सर्वस्व दान कर आ जाता है, पर आज तो रक्षा-बंधन है, आज क्यों?

निरालाजी सरलता से बोले, “ये दुई रुपय्या तो इस रिक्शा वाले के लिए और दस रुपय्ये तुम्हें देना है। आज राखी है ना! तुम्हें भी तो राखी बँधवाई के पैसे देने होंगे।”

ऐसे थे फक्कड़ निराला और ऐसी थी उनकी वह स्नेहमयी ‘दीदी’।

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#अनोखा_भाई !

3 thoughts on “#अनोखा_भाई !

  1. निरालाजी का नाम निराला यूँ ही नहीं था बल्कि वे वास्तव में ही निराले थे. रूखे रूखे बाल बिखरे रहते. न कभी उन्हें संवारना न तेल आदि डालना. . किसी ने उन्हें सुगन्धित तेल दिया और कहा, “पंडितजी ! ये आपके लिए एक साल तक काफी रहेगा. ख़त्म हो जाये तो बता देना. निरालाजी न शीशी खोली और सारा तेल अपने सिर पर उड़ेल लिया. तेल उनकी दाढ़ी पर से सैर करता हुआ उनके सिलवटी वस्त्रों पर और वे ठहाका लगा कर बोले, “भैय्या ! ई तो ख़त्म. दुई-चार और ले आवो!” ऐसे फक्कड़ थे निरालाजी !

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    निरालाजी का नाम निराला यूँ ही नहीं था बल्कि वे वास्तव में ही निराले थे. रूखे रूखे बाल बिखरे रहते. न कभी उन्हें संवारना न तेल आदि डालना. . किसी ने उन्हें सुगन्धित तेल दिया और कहा, “पंडितजी ! ये आपके लिए एक साल तक काफी रहेगा. ख़त्म हो जाये तो बता देना. निरालाजी न शीशी खोली और सारा तेल अपने सिर पर उड़ेल लिया. तेल उनकी दाढ़ी पर से सैर करता हुआ उनके सिलवटी वस्त्रों पर और वे ठहाका लगा कर बोले, “भैय्या ! ई तो ख़त्म. दुई-चार और ले आवो!” ऐसे फक्कड़ थे निरालाजी !

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