#अनोखा_भाई !

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निरालाजी का नाम निराला यूँ ही नहीं था बल्कि वे वास्तव में ही निराले थे. रूखे रूखे बाल बिखरे रहते. न कभी उन्हें संवारना न तेल आदि डालना. . किसी ने उन्हें सुगन्धित तेल दिया और कहा, “पंडितजी ! ये आपके लिए एक साल तक काफी रहेगा. ख़त्म हो जाये तो बता देना. निरालाजी न शीशी खोली और सारा तेल अपने सिर पर उड़ेल लिया. तेल उनकी दाढ़ी पर से सैर करता हुआ उनके सिलवटी वस्त्रों पर और वे ठहाका लगा कर बोले, “भैय्या ! ई तो ख़त्म. दुई-चार और ले आवो!” ऐसे फक्कड़ थे निरालाजी !

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