मी लाॅड ,यह कविता नहीं मेरी गवाही है !

Pandits Of J&K

मी लाॅड ,यह कविता नहीं मेरी गवाही है !

(सुप्रीम कोर्ट के हालिया अफसोसनाक फैसले से व्याकुल कवि दिलीप कुमार कौल की यह कविता कई ज़रूरी सवाल उठाती है । यह तर्क देकर कि 27 बरस पुराने हो चुके लाखों कश्मीरी पंडितों के देश निकाले, उनके उत्पीड़न और उनकी हत्याओं की जाँच अब नहीं की जा सकती, सुप्रीम कोर्ट ने ‘डिनायल आॅफ जीनोसाइड ‘ (Denial of Genocide) सरीखा निर्णय देकर न्याय प्रदान करने की एकतरह से समय सीमा बांधी है । इसके दूरगामी प्रभाव होंगे। न्याय की गुहार लगाने वाले भारतीय नागरिकों पर -अग्निशेखर )

## मित्र और कवि / लेखक / चिन्तक अग्निशेखर जी की वाल से साभार

मी लाॅड, यह कविता नहीं मेरी गवाही है !

-दिलीप कुमार कौल

“हत्यारे गदगद हैं

और हताहतों की आत्माएं

भटकने को अभिशप्त”,

यह बुझी हुई सी आवाज़

किसी की भी हो सकती थी

लेकिन न्यायमूर्ति ने मेरी ओर उंगली उठाकर कहा,

“जो कुछ कहना है

कटघरे में आकर कहो…”

यह फैसले के बाद की सांत्वना थी

या अदालत की सामान्य कार्रवाई?

जो भी था

मैं तो भीड़ में से

यों ही चुन लिया गया था

कुछ ही क्षण पहले

फैसला आ चुका था

कि सत्ताईस बरस गुज़र जाएं

तो चुन चुन कर की गई हत्याएं

सामान्य सी मौतों में बदल जाती हैं

बरसों की धूल में

सबूत दब जाते हैं

और अंत्येष्ठियों की यात्राओं से

थक कर टूट जाती हैं गवाहियां….

मी लॉर्ड!

आपने तो हमसे भी प्राचीन हत्याओं के सबूत

फूंक फूंक कर निकाले हैं

वक्त की गहराइयों में से

यहां तक कि विवादों को ख़त्म करने के लिये

सदियों पुराने विवादास्पद ढांचों की

नींव तक खुदवा दी…

*,^/“देखो तुम कटघरे में नहीं आए तो

अदालत की

अवमानना के दोषी हो सकते हो…”

मी लॉर्ड!

मैं जहां से बोल रहा हूं

वहां भी कटघरे में ही हूं

मैं मानता हूं कि मैं ही दोषी हूं

श्राद्धों और तर्पणों की भीड़ से भरे

इन सत्ताइस बरसों में

मैं तो भूल ही गया था

हत्यारों को

जिन्होंने फेंक दिया था

आग बरसाते सूरज के नीचे

उन मेरे अपनों को

जो जन्म से ही

शीतल हवाओं के आदी रहे थे

ज़िन्दगी जीने की कोशिश में

उनके भीतर का पानी

निचुड़ता चला गया

वे मरते चले गये हज़ारों की तादाद में

और उन्हें गिनते हुये

मैं सोचता रहा कि

यह संहार

कितनी देर तक बहता रहेगा मेरी रग रग में!

यह आख़िरी अदालत थी, मी लॉर्ड!

जो सबूतों के लिये

पुरातात्त्विक उत्खनन करवाने के लिये

मशहूर थी

पर मेरी हत्याओं के लिये

कुछ बरसों की धूल झाड़ने में

असमर्थ थी

मी लॉर्ड!

वैज्ञानिक प्रमाण ही आपको

असमर्थता से

उबार सकते हैं

मैं कोई भी यातना सहने के लिये तैयार हूं

विद्युत आवेश से

उत्तेजित करवाइये

मेरी स्नायु कोशिकाओं को

निकाल लाइये मेरे भीतर से

हत्याओं की गवाहियां

विद्युत आवेश के प्रवाह के साथ ही

हर हत्याओं का मातम

आंखों में उतर आएगा

“शिव शिव शम्भो” के असंख्य उच्चारण

जीभ पर उतर आएंगे

गूंज उठेंगे हत्यारों के नाम

मेरे अपनों के वे हज़ारों हाथ

छटपटाकर चारों ओर फैल जाएंगे

जो सदियों तक

सुबह नींद खुलते ही

आंखों के आगे आ जाते थे

और

“कराग्रे वसते लक्ष्मी, करमध्ये सरस्वती

के उच्चारण के साथ

आंखों को सहलाते थे

वो हज़ारों आंखें और हाथ

मेरी नींद में तैरते हैं

‘ ‘ और जागरण में भी

हत्यारों के हाथ तो

राजकीय आदर-सत्कार से

इतने नर्म हो चुके हैं कि

टेलिविजन स्क्रीन पर भी

उनकी कोमलता

साफ़ दिखाई देती है।

“तुम कविता करने आये हो या

गवाही देने?”

न्यायमूर्ति क्षुब्ध हैं

“मी लॉर्ड

यह कविता नहीं मेरी गवाही है

और सबूत के तौर पर

मेरे पास

कविता के सिवा

कुछ नहीं है।

##

(29 जुलाई 2017)

 

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मी लाॅड ,यह कविता नहीं मेरी गवाही है !

One thought on “मी लाॅड ,यह कविता नहीं मेरी गवाही है !

  1. सर्वोच्च न्यायपालिका से भी न्याय न मिले तो कोई बताये कि हम कहाँ जाए,
    भटकते भटकते पाँव में छाले पड़ गए कब तक धक्के खाएं कोई तो बताये ?
    डॉ क्षजान भारद्वाज

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