दादीजी की मित्र चिड़ियायें या चिड़ियाओं की मित्र दादीजी?

Sparrow
दादीजी रोज़ चिड़ियों को दाना डाला करती थीं. चिड़ियाएँ उनसे इतना घुल मिल गईं थीं कि उनको बाहर आते देख कर ही कोई उनके सिर पर बैठ चौंच मारे और कोई उनके कन्धों पर. दादी भी उनको खूब पुचकारती. जब अति हो जाती तो दादीजी गुस्सा भी करतीं. मगर चिड़ियाएँ कहाँ मानने वाली थी ?

जब हम बी.ए कर रहे थे तो दादीजी काफी बूढी हो चुकी थीं. आँखों पर चश्मा. हाथ में लाठी. झुक कर लाठी के सहारे चलना. मगर चिड़ियाओं को दाना डालना उनका भोजन करने से पहले व्रत समान था.

दादीजी बीमार हुईं. और फिर खाट से उतर ही न पाईं. उतरी तो उनकी निर्जीव देह और वो भी कुशा के बिछावन पर. शरीर पूरा हुआ करीब 4 बजे सुबह. उस दिन प्रात: हमें स्वपन आया जैसे दादीजी हमें पुकार रही हों, “अरे सोता ही रहेगा क्या? दादी से आखिरी बार नहीं मिलना क्या?”

हम हडबडा कर उठे. अपने कक्ष-साथी को जगाया और स्वपन के बारे में बताया. उसने हौंसला दिया और कहा, “दादी की उम्र बढ़ गई. फ़िक्र न कर.” मगर हम बेचैन ही रहे. उसी समय हमने साईकिल उठाई और चल पड़े गाँव की और जो करीब 20 किलोमीटर दूर था. हम पहुंचे करीब 6 बजे.

घर पहुंचे तो हम स्तब्ध. दाह संस्कार की तैयारियाँ चल रही थीं. बाहर चिड़ियाएँ शोर मच रही थीं. दाना डालने वाला पंछी तो उड़ चुका था. अब दाना कौन डाले ? वैसे भी सब गम में डूबे थे.

हमने दादीजी की डलिया उठाई और दाना डाल दिया. मगर ये क्या ? एक भी चिड़िया दाना नहीं उठा रही थी. इसके विपरीत वे सब मिलकर हमारे सिर में चौंच मारने लगीं.

खैर ! अर्थी तैयार हुई. उसे बाहर लाया गया. उस पर शव रखा जाने लगा तो चिड़ियाएँ होश-हवास खो बैठी. उनका शोर कान फोड़ने वाला था. हम सब (खास कर मैं) हैरान थे चिड़ियाओं के दादीजी के प्रति प्रेम को देख कर.

उसके बाद वे चिड़ियाएँ हमारे आँगन में कभी न उतरी.

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दादीजी की मित्र चिड़ियायें या चिड़ियाओं की मित्र दादीजी?

2 thoughts on “दादीजी की मित्र चिड़ियायें या चिड़ियाओं की मित्र दादीजी?

  1. उस दिन प्रात: हमें स्वपन आया जैसे दादीजी हमें पुकार रही हों, “अरे सोता ही रहेगा क्या? दादी से आखिरी बार नहीं मिलना क्या?”

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    उस दिन प्रात: हमें स्वपन आया जैसे दादीजी हमें पुकार रही हों, “अरे सोता ही रहेगा क्या? दादी से आखिरी बार नहीं मिलना क्या?”

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