जाएँ कहाँ ?

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पराये पराये होते हैं

सार्वभौमिक बात है

अपने पराये हो जाते हैं

यह भ हमें ज्ञात है,

मगर जब अपने आप में ही

हम हो जाएँ पराये

ऐसे में कोई हमें बताये

भला हम कहाँ जाएँ?

कभी कभी ऐसा भी होता है

अपना ही चेहरा

अनजान सा लगता है.

अथक कोशिश बाद भी

वह बेगाना सा लगता है

जब स्वयं को ही हम

न पहचान पायें,

ऐसे में कोई हमें बताये

भला हम कहाँ जाएँ?

दूसरों के जीवन में

ताँक-झाँक करने वाले

हर किसी को जानने

का दावा करने वाले

अपने अंतर में ही वे

न जब झाँक पायें,

औरों को क्या? सवयं को भी

न जान पहचान पायें.

ऐसे में कोई हमें बताये

उनकी घूरती आँखों से

बचने को भला हम कहाँ जाएँ?

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जाएँ कहाँ ?

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