नोटबंदी

 

 

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पिछले सप्ताह हमने अपने मित्रों के विचार जानने के लिए लिंक्डइन पर एक प्रश्न पोस्ट किया था. प्रश्न था:

बस सच बोलना : क्या कोई मित्र बता सकता है कि नोटबंदी से मोदीजी द्वारा किये गए कौन से उद्देश्य पूरे हुए?

पक्ष और विपक्ष में बहुत प्रतिक्रियाएं मिली. कई भद्र मित्रों ने तो हमें ज़ली-कटी भी सुनाई. हमें विक्षिप्त तक घोषित कर दिया. इन साथियों का विशेष आभार क्योंकि कबीर ने भी तो कहा है न कि “निंदक नीयरे राखिये आँगन कुटी छवाय…”

अब ज़रा नोटबंदी के इतिहास पर गौर करते हैं और देखते हैं कि पहले क्या हुआ? देश में इससे पहले दो बार बड़े नोटों पर तथाकथित ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की जा चुकी है. पहली बार 1946 में एक हज़ार और दस हज़ार रुपये के नोट बन्द किये गये थे. उसके बाद 1978 में तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री मोरारजी भाई देसाई की जनता सरकार ने एक हज़ार, पाँच हज़ार और दस हज़ार के नोट बन्द किये थे. उस समय श्री देसाई सरकार में श्री मनमोहन सिंह ही वित्त सचिव थे.

मक़सद यही था कि काले धन को बाहर निकाला जाए. लेकिन दोनों बार इस मक़सद में कोई कामयाबी नहीं मिल सकी. यह बात ख़ुद वित्त मंत्रालय की 2012 की उस रिपोर्ट में दर्ज है जिसे केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के अध्यक्ष के नेतृत्व में बनी कमेटी ने पेश की थी.

शायद ये पुराना अनुभव ही था कि श्री मनमोहन सिंह जब प्रधानमंत्री बने तो बड़े नोटों को रद्द करने के सुझावों को उन्होंने कभी गम्भीरता से नहीं लिया.

पड़ोसी म्याँमार में 1964 और 1985 में यही प्रयोग किया गया था और उसे भी नाकामयाबी ही हाथ लगी थी. इस असफलता के बावजूद म्यांमार ने तीसरी बार फिर से 1987 में मुद्रा रद्द की. और जब तीसरी बार यह किया गया तो पुराने बड़े नोटों के बदले में कुछ भी दिया भी नहीं गया. यानी क़रीब तीन-चौथाई मुद्रा लोगों के हाथ से बिलकुल निकल गयी.

लेकिन क्या इतने कठोर कदम के बाद भी वहाँ काले धन की समस्या ख़त्म हो गयी? नहीं. बल्कि उससे हुआ यह कि म्यामार के वित्तीय संस्थानों से लोगों का भरोसा ही उठ गया और उसके उपरांत उन्होंने अपना फ़ालतू पैसा सिर्फ़ ज़मीन और सोने में लगाना शुरू कर दिया.

यह स्थिति अर्थव्यवस्था को जड़ कर देती है क्योंकि सोने और ज़मीन में लगे धन का इस्तेमाल किसी उत्पादक काम में तो होता नहीं. फिर अर्थव्यवस्था का पहिया कैसे घूमे? श्रीलंका में भी 1970 में ऐसा किया जा चुका है. वहाँ तो सौ और पचास तक के नोट बदल दिए गये थे. लेकिन यह प्रयोग वहां भी विफल ही रहा.

अब आप ज़रा मौजूदा स्थिति पर नज़र डालें. मोदीजी ने दावा किया था कि:-

१. नोटबंदी से काला धन ख़त्म होगा.

२. नकली मुद्रा ख़त्म हो जाएगी.

३. आतंक समाप्त होगा.

४. तस्करी बंद हो जाएगी.

५. जम्मू-कश्मीर में देशविरोधी ताकतों पर लगाम लगेगी.

अब पाठक स्वयं तय करें कि उपरोक्त पांच लक्ष्यों में से कितने लक्ष्य और कितनी मात्रा में पूर्ण हो पाए? हम तो अब भी और रोज़ ही नकली मुद्रा, आतंकी, तस्करी और कश्मीर में देशविरोधी ताकतों की हरकतों के समाचार सुनते रहते हैं. अब तो हालात कुछ ऐसे हो गए हैं कि जिन लोगों (नीतीशजी, रामदेव, उद्धव ठाकरे, शरद पवार यद्यपि शरद को तो पद्म विभूषण देकर उनका मुँह बंद रखने के प्रयास भी किये गए) ने नोटबंदी की तारीफ़ की थी, वे भी इसके विरोध में उतर आये हैं.

हम. अर्थशास्त्री तो हैं नहीं. आर्थिक स्थिति पर नोटबंदी का क्या प्रभाव हुआ हम कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हैं? इसकी समीक्षा हमारे वे मित्र करें जिनको आर्थिक मामलों पर पकड़ है…………………………………………….आलेख को पढने के लिए आपका ह्रदय से आभार…………..

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नोटबंदी

One thought on “नोटबंदी

  1. नोटबंदी के कारण जो व्यक्तिगत हानियाँ हुई उनसे आप सब परिचित हैं. 150 से ऊपर जानें गईं. धनाभाव मे अनेक विवाह स्थगित हुए या रिश्ते तोड़ दिए गए. इससे लड़कियों की मन:स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ा होगा, कल्पना से परे हैं? लाखों दिहाड़ी मजदूर और कर्मचारी काम न होने के कारण घरों को लौट गए. व्यापर ठप्प सा रहा…और भी बहुत कुछ…..

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