३१ दिसंबर २०१६ : बैंगलोर छेड़छाड़ प्रकरण.

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श्री रामचंद्र गुहा (इतिहासकार) का लेख, 07 जनवरी 2017, दैनिक हिन्दुस्तान, से साभार ।
31 दिसम्बर 1938, ‘हरिजन’,”स्टूडेन्ट शेम” लेख में गाँधी जी से एक युवती (करीबी पुरुषों के यौन उत्पीड़न से पीड़ित) के द्वारा पूछा गया प्रश्न ,

“इस परिस्थिति में कोई लड़की कैसे अहिंसा का पालन करे? और खुद के साथ साथ दूसरों की रक्षा कैसे कर सकती है? नारी जाति के साथ इस तरह का भद्दा व्यवहार करने वाले इन बीमार मर्दो का क्या इलाज है?

इस प्रश्न का उत्तर देते हुए लिखा, पुरुषों द्वारा छेड़झाड़ भिरत में “बढ़ रही बुराई” है। ऐसे मामले अखबारों छपने चाहिए और दोषियों के नाम सार्वजनिक होने चाहिए।

पीड़िताओं से दोषियों के नाम सार्वजनिक करने का आग्रह करते हुए सभ्य समाज को ऐसे दोषियों को दण्डित करने का उपाय सुझाया।

“समान वर्ग का.होने के नाते नौजवानों को अपनी छवि के प्रति संवेदनशील होना चाहिए और अपने साथियों के साथ होने वाले अनुचित व्यवहार से निपटना चाहिए ।”

“युवतियों को आत्मरक्षा की सामान्य कलाएँ सीखनी चाहिए।”

कुछ और विचार करते और समाधान सुझाते हुए गाँधी जी टिप्पणी करते हैं , “मुझे यह बात चिंतित करती है , जब एक आधुनिक युवती आधा दर्जन रोमियों की जूलियट बनना पसंद करती है। उसे रोमांच पसंद है । आधुनिक महिला ऐसे लिबास पहनती है, जो उसे गर्मी, सर्दी और बरसात से नहीं बचाते , मगर आकर्षण का केन्द्र जरूर बना देते हैं। वह खुद को प्रकृति से ऊपर देखना चाहती है। अहिंसा का रास्ता ऐसी लड़कियों / महिलाओं के लिए नहीं है।”

इस लेख को पढ़ कर बंगाल की 11 युवतियों ने गाँधी जी को एक सामूहिक हस्ताक्षरों वाला पत्र लिखा , जो शायद जनवरी 1938 का है।

गाँधी जी की लिबास और आधा दर्जन रोमियो वाली टिप्पणी से आहत हो वे कहती हैं ,

“बेशक कुछ लोगों की नज़र में आधुनिक लड़कियों के लिबास और आचार व्यवहार ऐसे नहीं होते जैसा वे चाहते हैं। मगर आपका उनको इस तरह पेश करना कि वे आकर्षण का केन्द्र बनने की कोशिश करती हैं, दर असल पूरी महिला बिरादरी का अपमान है। बेहतर चरित्र और शालीन व्यवहार की अपेक्षा सिर्फ आधुनिक लड़कियों से ही नहीं , पुरुषों से भी होनी चाहिए।भले ही कुछ लड़कियाँ दर्जनों रोमियों की जूलियट बनना चाहती होंगी , मगर आपकी इस बात में आधा दर्जन रोमियों का जिक्र भी शामिल है , जो सड़को पर जूलियट की तलाश में भटकते रहते हैं। लिहाजा सुधार की असल जरूरत जहाँ है , उसकी ओर इशारा करे़ं। आपकी यह दुर्भाग्यपूर्ण टिप्पणी एक बार फिर इस ग्लानिपूर्ण मुहावरे को बल देती है कि ‘महिला नरक का द्वार है’।

वे युवतियाँ साथ यह भी कहती हैं कि “हमारी तमाम बातों का यह मतलब कतई नहीं निकाला जाना चाहिए कि हम आधुनिक लड़कियाँ आपका सम्मान नहीं करतीं। हर बेटे (मर्द) की तरह वे भी आपकी इज्जत करती ह़ै। अगर लड़कियाँ वास्तव में गुनहगार हैं, तो वे अपनी जीवन शैली बदलने को तैयार हैं, मगर बुरा भला कहने से पहले उनकी गलती , यदि कोई है, तो पूरी तरह साबित की जानी चाहिए। इस संदर्भ में वे न तो ‘महिला’ होने का लाभ लेना चाहती हैं और न ही मूकदर्शक बन कर जज को मनमर्जी से अपनी निन्दा करने देगीं। सच का सामना किया जाना चाहिए, और इन जूलियटों के पास इतना साहस तो है कि वे इन (बिगडैल युवाओं ) का सामना करती हैं।”

इस लगभग एक शताब्दी पुराने प्रकरण पर पुनः स्वस्थ विमर्श की आवश्यकता है।

हलाकि लेखक रामचंद्र गुहा अपनी राय देते हुए लिखते हैं ,

“यह वाकई शर्म का विषय है कि महात्मा गाँधी और इन बंगाली युवतियों की इस बहस को हम भूल बैठे हैं।…इन 11 युवतियों के सराहनीय तरीके से अपनी खुली मानसिकता के साथ एक महान भारतीय महात्मा गाँधी का विरोध किया था और उनके पूर्वाग्रहों को बेनकाब किया था ।और अच्छी बात है कि उनका विरोध जायज भी था।”
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३१ दिसंबर २०१६ : बैंगलोर छेड़छाड़ प्रकरण.

One thought on “३१ दिसंबर २०१६ : बैंगलोर छेड़छाड़ प्रकरण.

  1. बेहद अफ़सोस !
    दशाब्दियों बाद भी समस्या का निराकण होने की बजाय कई प्रतिशत बढ़ी ही है.
    समस्या आज भी जस की तस है. और कोई उम्मीद नज़र आती कि इसमें कोई सार्थक बदलाव आएगा. मगर एक राह है जिसे हमारे नीति-निर्माता कभी नहीं मानने वाले क्योंकि ऐसे शोहदों में अधिकतर उन्हीं के साहबजादे होते हैं. जो भी किसी लडकी छेड़ता मिल जाए उसका अंग-भंग किया जाना चाहिए. इसके बिना ये बीमारी ख़त्म नहीं होने वाली. हमारा दावा है कि इसके लागु होते ही ५०% की कमी स्वत: आ जाएगी. रही सही दो-चार को सजा मिलते ही ख़त्म हो जाएगी…..अन्यथा बच्चियों/लड़कियों/स्त्रियों को यूँ ही भुगतते रहना होगा………………..सुझावों का स्वागत है.

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