प्रथम आलिंगन

 

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सन १९६८. बात उन दिनों की है जब हम शादी के बाद अपनी नई नवेली दुल्हन को गौना करा कर घर लौट रहे थे. अब लग रहा था ससुर जी की बात न मानने की ही सजा मिल रही थी. ससुर जी पुलिस अधिकारी थे. उनको ये गवारा नहीं था कि उनकी बेटी को उनका दामाद गौना भी बस में ले जाकर करवाये. उन्होंने कहा हम गाड़ी मंगवा देते हैं. मगर ये प्रस्ताव हमें अपने सम्मान के विरुद्ध लग रहा था और उनके प्रस्ताव को एक सिरे से खारिज कर दिया था ! वे भी हमारी जिद के सामने क्या करते? खैर! हम पत्नी को बस से ही लिवा लिए चले.


उन दिनों बस भी क्या खटारा होती थीं. दिल्ली से नज़फगढ़ और वहां से दूसरी बस पकड़ी. गाँव से करीब २ मील उतरना था. सो हम भी उतरे. उसके बाद कोई साधन न था. सो वहां से चले पैदल. कोई एक मील चले होंगे कि ज़ोरदार आंधी, वर्षा और तूफ़ान ने घेर लिया. आंधी इतनी ज़ोरदार कि देखते ही देखते कई पेड़ धराशाई हो गए. इतनी ज़बरदस्त आंधी और तूफ़ानी बारिश न पहले देखी थी न बाद में.


शरीर संभाले नहीं संभल रहा था. हम तो ठहरे गंवई मगर शहर में पली-पोसी पत्नी हैरान-परेशान. हम भी हतप्रभ. पत्नी के साथ के पहले सफ़र का ये अनुभव ! तय नहीं कर पा रहे थे ये शुकन है अपशकुन? हम न केवल शर्मिंदा हो रहे थे बल्कि हंसी से लोट पोट भी हो रहे थे क्योंकि बेचारी नई नवेली कभी यहाँ से पल्लू संभाले तो कभी साड़ी को जो थी घुटनों से ऊपर उड़ने को बेताब. लगता था जैसे उनमें और तूफ़ान में द्वंद्व चल रहा हो. इस सब से वो जूझ ही रहीं थीं कि न जानें कहाँ से टीन की चद्दर हवा में उडती हुई हमारे पास से गुजरी. हम दोनों बाल बाल बचे. हम इतना घबराए कि काटो तो खून नहीं. हमने आव देखा न ताव, पत्नी को बाहों में लेकर एक गड्ढे में दुबक गए. खैर तेज़ हवा से तो राहत मिली मगर हमें अपनी शरण-स्थली ज़ल्दी ही छोडनी पड़ी क्योंकि उसमें पानी तेज़ी से भरना शुरू हो गया था.


अब हम कहाँ जाए? सोच ही रहे थे कि एक कुत्ते के रोने कि आवाज़ आई. हम ने थोड़ी दूर पर देखा कि एक झोंपड़ी है. हम दोनों उस और लपके. सामान सारा भीग गया था. झोले भीग कर भारी हो गए थे. हमने उनको एक पेड़ के नीचे छोड़ा और कुटिया की ओर भागे. कीचड में पैर धंस धंस जा रहे थे. हमें ही मुश्किल हो रही थी. पत्नी की तो हम क्या कहें?


खैर गिरते पड़ते हम कुटिया पर पहुंचे. देखा कुटिया को बीचों-बीच सहारा देने वाला लक्कड़ कुत्ते पर गिरा पड़ा है और वो उसके नीचे से निकलने के लिए छटपटा और चिल्ला रहा है. हमने उस शहतीर को एक और सरकाया और कुत्ते को मुक्त किया. कुत्ता ज़ख़्मी हो गया था. मुक्त होते ही वो हमारी बाईं बगल में घुस गया क्योंकि दाईं और तो दुबकी पत्नी वक्ष से लगी थीं. ये था हमारा और पत्नी का प्रथम आलिंगन.


हम हैरान हैं. किस पर ? हम आज तक इसी उहापोह में हैं. ससुर जी की अवहेलना करने पर या तूफानी बारिश पर या इस अनूठे गौने पर या प्रथम आलिंगन पर ! कैसा लगा हमारा प्रथम आलिंगन और मिलन !
इसी सितंबर की 28 को वे हमें छोड़ संसार से विदा हो गईं।


*************************************************************डॉ भारद्वाज क्षजान

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