फितरत

 

lizard-2एक गिरगिट
भटकते भटकते
अपने साथियों से बिछुड़
एक बस्ती में आ गया,
हर पल
हर क्षण
मानव को रंग बदलते देख
सिर उसका चकरा गया।

इतनी बात तो उसने
जान ही ली
रंग बदलने में मनुष्य ने
उसे भी है मात दी।

इतना आत्म-ज्ञान होने पर
शर्म के मारे
उसने चुल्लू भर पानी में
डूब मरने की ठान ली। *************************************डॉ भारद्वाज क्षजान

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फितरत

2 thoughts on “फितरत

  1. Manuyah itna gir gya ,rang tho dur ki baat wo apni bewi tak badal dia,wo tho bhul gya maa ki pyar or dular, badal gya wo jamana badal gya wo sansar, ho saky tho wo manushya dekh ly apna chehra ek baar..

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  2. सत्य वचन विभाश। और ये भी सत्य है कि सब कुछ जानते हुए भी हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में हमने तो यही तय किया है कि संसार को तो हम बदल नहीं सकते मगर हमें अपने अंदर सुधार लाने से कौन रोक सकता है? आशीर्वाद !

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