कर्म और भाग्य

 

6192502932_ce56e450f8_bएक पान वाला था। जब भी पान खाने जाओ ऐसा लगता कि वह हमारा ही रास्ता देख रहा हो। हर विषय पर बात करने में उसे बड़ा मज़ा आता। कई बार उसे कहा की भाई देर हो जाती है जल्दी पान लगा दिया करो पर उसकी बात ख़त्म ही नही होती।


एक दिन अचानक कर्म और भाग्य पर बात शुरू हो गई।


तक़दीर और तदबीर की बात सुन हमने सोचा कि चलो आज उसका दर्शन-शास्त्र देख ही लेते हैं। मैंने एक सवाल उछाल दिया।


मेरा सवाल था कि आदमी मेहनत से आगे बढ़ता है या भाग्य से? और उसके जवाब से मेरे दिमाग़ के सारे जाले ही साफ़ हो गए।


कहने लगा,आपका किसी बैंक में लाकर तो होगा? उसकी चाभियाँ ही इस सवाल का जवाब है। हर लाकर की दो चाभियाँ होती हैं। एक आप के पास होती है और एक प्रबंधक के पास। आप के पास जो चाभी है वह है परिश्रम और  के  प्रबंधक पास वाली भाग्य। जब तक दोनों नहीं लगतीं ताला नही खुल सकता।आप कर्मयोगी पुरुष हैं ओर प्रबंधक भगवान।अाप को अपनी चाभी भी लगाते रहना चाहिये।पता नहीं ऊपर वाला कब अपनी चाभी लगा दे।

कहीं ऐसा न हो कि भगवान अपनी भाग्यवाली चाभी लगा रहा हो और हम परिश्रम वाली चाभी न लगा पायें और ताला खुलने से रह जाये ।

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कर्म और भाग्य

8 thoughts on “कर्म और भाग्य

  1. कर्म के बिना भाग्य और भाग्य के बिना कर्म : क्या दोनों एक दुसरे के पूरक हैं ? फैसला पाठकों पर छोड़ते हैं. वे ही हमारा मार्ग-दर्शन करने में सक्षम हैं.

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  2. Beautiful post. As shop keeper said is true .His lines are valid in this world as we know that fortune favours the brave so yes we need the effort first for the result then even the luck will come into.and totally depending on luck will be like walking on ferry in ocean that I will collapse no body knows 😊😊

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      1. Thank you sir.i always follow you and I am going to soon order your book as soon as I get the time 😊😊 u r an inspiration 😊😊

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