निरुत्तर-गुरुदेव

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गुरुजी, आप मुझसे मेरी चमड़ी भी मांग लाते तो मैं एक क्षण भी नहीं लगाता। आपने मांगा भी तो क्या? जो मैं दे नहीं सकता। क्या मैं उस दूध को भूल जाऊँ जिसको पीकर मैं इत्ता बड़ा हुआ? क्या मैं बाप की उस गोद को भूल जाऊँ जिसमें खेल कर में बड़ा हुआ? या मैं उस सहोदरा को भूल जाऊँ जो हर वर्ष अपनी रक्षा की कामना में मेरी कलाई सजाया करती थी? उसकी रक्षा तो दूर, वहशिओं ने उसे मेरी आँखों के सामने निर्वस्त्र कर हम सबको जलील किया था और मैं कुछ भी ना कर पाया था। न गुरुजी न। इन सबका कर्ज़ है इस सिर पर। जब तक वह ना उतार लूँ, यह संभव नहीं।

सुनकर पंडित ब्रह्मदेव की आँखें भी नम हो आईं थीं।

वह खुद गवाह थे उस बर्बरता के।

जागीरदार की सरासर बेईमानी, उसके बाद ज़मीन के छोटे से टुकड़े जिस पर चार जीव हाड़ तोड़ मेहनत कर किसी तरह पेट भरने का जुगाड़ कर लेते थे, का हड़पा जाना, विरोध करने पर श्यामू कोली के माँबाप को पीट कर मार डालना, और उस समय तो हद्द ही हो गई थी जब श्यामू की आँखों के सामने उसकी बहन को निर्वस्त्र कर बेआबरू किया गया था जिसका बाद में पता तक नहीं लग पाया था।

गनीमत ही हुई थी कि जागीरदार के आदमियों ने श्यामू को मरा समझ कर नाले में फेंक दिया था। रात उधर से गुजरते तथा उसे कराहते सुनकर किसना गिरोह ने उसे उठा, दावादारू कर ठीक किया था।

पाँच: दिन तो वह पड़ा पड़ा माँबाप बहन को याद कर रोता रहा।

किसना उसके गम को समझता था।

यह उसकी कोई अकेले की कहानी तो थी नहीं। गिरोह के हर सदस्य की ऐसी ही मिलीजुली कहानी थी। अत: उसने श्यामू को रोते रहने दिया था। किसना का यह अपना तरीका था पीड़ित को अपनेआप शांत हो हथियारों की ओर मुखातिब करने का।

किसना ने कभी किसी को हथियार उठाने की सलाह नहीं दी थी।

जिसने भी शस्त्र उठाया था वो अपनी मर्ज़ी से।

दस दिन बाद एक दिन श्यामू किसना के करीब पहुंचा था और अपना दुखड़ा सुनाने की खातिर मुंह खोला ही था कि किसना ने उसे रोका और गिरोह के सदस्यों की ओर इशारा करते हुए कहा था, जवान, देखते हो इनको। अगर तुम इनके मन में झांकोगे तो अपने से भी अधिक व गहरे जख्म पाओगे। मगर ये रोते नहीं रहे। इन्होंने कोई शौक में हथियार नहीं उठाए। दूध के कर्ज़ के कारण ही ये सब विवश हुए थे।

क्या ये ठीक है?

ये तय करना आपका काम है। हमारा धर्म था तुम्हारी दवादारू करना, तुम्हारा धर्म क्या है, तुम जानो। लौटना चाहते हो, बेझिझक जाओ। कभी ज़रूरत पड़े तो लौट आना। हमारे दरवाज़े उन सब के लिए खुले हैं जिनकी सुनवाई न पुलिस करती है न ही प्रशासन।

श्यामू की आँखों के सामने अंधेरा सा छा गया था और उसी अंधता में अचानक आ गई थी उसके हाथों में स्टेनगन जिसे तजने के लिए कह रहे थे श्यामू के पूर्वगुरुदेव पंडित ब्रह्मदेव। मगर शिष्य के हर प्रश्न का तत्पर उत्तर देने वाले गुरुदेव आज खड़े थे शिष्य के सामने निरुत्तर  बुत बन कर।

 

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