प्रेम पर वार्ता

 

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अग्नि शेखर जी जो काफी विद्वान है, से “प्रेम” पर वार्ता। साथियों के लिए साझा कर रहे हैं। आनंद लें। टिप्पणियों का स्वागत है।
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हम : प्रणाम मित्र । जो प्रेम करने की डींगें मारते रहते हैं, वे बगलें झाँकने लगते हैं जब पूछा जाता है प्रेम होता क्या है? हा….हा….हा…..
Sat 6:43pm

शेखर जी : चिदानंद की अबाध अनुभूति

हम : हा….हा……ये चिदानंद जी कौन हैं भाई जी ? दशरथ मांझी की सनक ?

शेखर जी : आपका मूल स्वरूप ।

हम : ओह ! धन्यवाद। मगर हमारा संदेश था प्रेम क्या होता है? और अनुभूति की परिभाषा असंभव है।

शेखर जी : यह शब्दातीत अवस्था है

हम : जी। सही कहा।

शेखर जी : जो व्याख्या करते हैं, ढोंगी हैं

हम : जी। प्रेम को हम तो “गूंगे का गूड़” कहते हैं।

शेखर जी : गूंगे का गुड़ कहकर भी अनुमानिक है
अव्यक्त

हम :ठीक कहा। प्रेम भी अनुमानिक ही है। इसी लिए अपरिभाषित रह जाता है।

शेखर जी : इसीलिए उपमाओं,तुलना आदि अलंकारों से यतन करते हैं आप
नहीं कह पाते इस अमूर्तन को

हम : जी। ठीक कहा। आपसे वार्ता में आनंद आया। अब कोई पूछे “आनंद” की परिभाषा करो ????

शेखर जी : अभेद है,चीन्ह लें

हम : जी

शेखर जी : रसौ वैसे सःभी यही है

शेखर जी : आपको मेरे साथ वार्ता में ‘आनंद ‘ क्यों और क्या आया

हम : किसी विद्वान से वार्ता में आनन्द आना ही चाहिये।

शेखर जी : क्योंकि आप क्षणांश के लिए अपने मूल स्वरूप को छू आए।और आपको पता भी न चला

हम : ये तो बहुत बड़ी बात कह दी आपने। मूल स्वरूप को छूना !

शेखर जी : वहाँ यदि आप या हम टिक सकें तो मौन हो जाएंगे

हम : तभी तो ! उसके बाद तो कुछ बचता ही नहीं है।

शेखर जी : कुछ बच जाने या कुछ न बचने का बोध रहता ही नहीं ।

हम : जी। शून्य

शेखर जी : शून्य भी उस अवस्था से लौट कर ही लगता है

हम : जी । एक दम म ठीक।

शेखर जी : आप भावातीत में भावातीत होते हैं
पता नहीं क्या होते हैं

हम : तभी तो हमने गूगे का गूड़ कहा।

शेखर जी : जी। क्षमा करेंगे, पता नहीं क्या शेखी बघार गया मैं अज्ञानी हूँ

हम : अरे ना। वास्तव में हमें अच्छा लगा।

शेखर जी : यों ही कह दिया ,गुरुवर

हम : विचारों का अदान-प्रदान होते रहना चाहिए।

शेखर जी : जी।

हम :ठीक है। फिर मिलते हैं।

शेखर जी : आभार ।

हम : स्वागत

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2 thoughts on “प्रेम पर वार्ता

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