मानमर्दिनी

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आज पार्वती ६५ को पार कर चुकी है। एक जिंदगी गुज़र गई है । वो चाहती थी कि वो न केवल नीलेन्दु की और बल्कि सुधीर की भी “पारो” बनी रहे। मगर वो न नीलेन्दु की “पारो” बन पाई और न ही सुधीर की रह पाई। आज जब ज़माना बदल गया है तो उसे रह रह कर दोनों की याद सताती रहती है।

सुधीर उसका बड़ा भाई था। पिता तो क्षय रोग से ग्रस्त उसके जन्म से पहले काल कवलित हो चुके थे। माँ उसको जन्म देते ही चल बसी थीं। भाई सुधीर ही उसके माता-पिता-भाई-साथी सभी कुछ बने। उसके जन्म के समय सुधीर सिर्फ १२ वर्ष के थे। नाजुक कंधों पर जो भार अचानक आन पड़ा था, उसे उन्होंने बाखूबी निभाया था। न केवल उसने अपनी नन्ही सी बहिन का पालन-पोषण किया था बल्कि उच्च शिक्षा भी दिलाई थी।

स्नातक के द्वितीय वर्ष में उसका परिचय तृतीय वर्ष के छात्र नीलेन्दु से अकस्मात ही हुआ था। हुआ यूं कि एक वाद-विवाद प्रतियोगिता में दोनों एक दूसरे के आमने-सामने थे। विषय था “अपना जीवन, अपनी मर्ज़ी।” नीलेन्दु पक्ष में थे और पार्वती इसके विपक्ष में।

गरमा गरम वाद-विवाद जारी था। नीलेन्दु के अपने तर्क थे और पार्वती के अपने। दोनों बराबरी पर चल रहे थे। मगर पार्वती के इस तर्क ने कि जो अपने माँ-पिता-भाई का न हुआ वो दूसरे यानि प्रेमी-प्रेमिका का क्या और कैसे हो सकता है, नीलेन्दु को चारों खाने चित्त कर दिया था। और पार्वती प्रथम घोषित कर दी गई थी।

“काश ! उस दिन मैं उस वाद-विवाद में भाग ही न लेती!” ६५ वर्षीय पार्वती ने आह भरी।

पार्वती उस वाद-विवाद प्रतियोगिता में प्रथम क्या घोषित हुई कि नीलेन्दु तो उसके कायल हो गये। दोनों में मित्रता हुई, करीब आए और फिर न जानें एक दूसरे के मन में प्रेमांकुर कब फूटा, न नीलेन्दु को पता चला न ही पार्वती को। उसी दौरान नीलेन्दु ने भी उसका नाम पार्वती से “पारो” रख दिया था।

नीलेन्दु के मुँह से “पारो” सुन कर पार्वती का माथा ठनका क्योंकि भाई भी उसे शैशव काल से ही “पारो” कहा करते थे। वो ये नहीं तय कर पा रही थी कि ये शकुन है या अपशकुन ?

भाई से पार्वती कुछ भी न छिपाती थी। उसने नीलेन्दु और उसके प्रति अपने अनुराग की बात साफ साफ बता दी थी। सुधीर उसकी पसंद पर बहुत खुश हुए क्योंकि नीलेन्दु न केवल पार्वती की तरह सुंदर थे बल्कि उसके अनुरूप सुसंस्कृत भी थे। बस भाई की शर्त सिर्फ ये थी कि नीलेन्दु घर-जंवाई बन कर आयें क्योंकि वे अपनी छोटी बहिन जिसे उन्होंने बेटी की तरह पाला था और जिसे प्यार से “पारो” कहते थे, उनसे ज़ुदा न हो।

और ये नीलेन्दु को स्वीकार न था। पार्वती ने पहले नीलेन्दु को समझाना चाहा। मगर वो अपनी ज़िद पर अटल थे। फिर उसने अपना रुख भाई की ओर किया। मगर वे भी टस से मस न हों। हार कर पार्वती ने अपने आप को किस्मत के हवाले कर दिया था क्योंकि न वो पिता-तुल्य भाई को छोडने के लिए तैयार थी न ही अपने प्रथम प्रेम को। भाई ने अनेक रिश्ते उसे सुझाए। मगर वो आना-कानी करती रही। भाई, जिसने उसे अपने हाथों में रखा था, उसके सम्मुख लाचार हो जाते।

आज वो अपनी भावज-भतीजे के साथ है। भाई एक दुर्घटना के शिकार हो चुके हैं। नीलेन्दु कहाँ हैं, कुछ अता-पता नहीं। उसे “पारो” कहने वाले दोनों आज नहीं हैं। लेकिन दोनों आज भी उसके हृदय-स्थल पर काबिज हैं। मगर वो अब किसी की “पारो” नहीं है। पार्वती मात्र रह गई है। उसके प्रेम का ओज उसके मुख पर आज भी मौजूद है। वही प्रेम उसके मुख को दीप्तिमान बनाए हुए है।
पार्वती के बारे में तो हम बता ही चुके हैं। अब नीलेन्दु के बारे में पाठक अंदाज़ लगाते रहें कि उन्होंने विवाह किया या नहीं?

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