स्त्री-विमर्श

हमारे आज के संदेश/फेसबुक पर टिप्पणी के संदर्भ में संध्या जी से रोचक वार्ता : साथियों से अनुरोध है कि इस सामयिक विषय पर अपने विचा अवश्य रखें और चर्चा को आगे बढ़ाएँ।
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Good morning Friend. Women are the custodian of traditions. Women are losing vision fast. How will traditions survive?
प्रणाम मित्र। स्त्रियाँ परम्पराओं की संरक्षक हैं। वे आज अंतर्दृष्टि तेज़ी से खो रही हैं। परम्पराएँ जीवित रहेंगी कैसे?
Sun 9:21pm
संध्या जी : एक सफल पुरुष ही महिला की सफलता को हजम़ कर सकता है। महिलाओं को देश और घर की परम्परा के नाम पर ही तो आगे बढ़ने से रोका गया है।
क्या आधुनिक महिला पारंपरिक नहीँ हो सकती मान्यवर।
भारद्वाज : हो सकती है संध्या जी हो सकती है। हमारी माता जी सन ३० के आसपास की ८ पास थीं। उन दिनों स्त्रियाँ पढ़ी लिखी कहाँ होती थी? उन्होंने सभी परम्पराएँ निभाईं। कारण सिर्फ ये था कि वे अपना कर्तव्य समझती थीं। महत्वाकाक्षाएं ताक पर रख दी थीं या थी ही नहीं।
हम स्त्री-विरोधी नहीं हैं जैसा कि आप समझ बैठी हैं।
आज नारी स्वयं शोषण की शिकार बन रही है। आपको जान कर हैरानी होगी कि एक राष्ट्रपति भी एक जानी-मानी लेखिका का शारीरिक शोषण कर चुके हैं और ये उन लेखिका ने स्वयं उजागर किया है।
राजनीतिज्ञों को हवस पूरी करने के लिए और उद्योगपतियों को हवस और बाज़ार कि ज़रूरत पूरी करने के लिए रोज़ नई नारी चाहिए। और आज स्त्री अपनी महत्वाकांक्षाओं से बेबस उनकी आसानी से शिकार बन जाती हैं।
और यही कारण है कि परम्पराएँ ही क्या परिवार भी टूट रहे हैं।
अपने उद्गार रखने के लिए आप आगे आईं, अच्छा लगा।
संध्या जी : Bilkul sir
Aur me vikassheelta aur mahatvakanksha me antar samjhti hu
भारद्वाज : एक बात बताएं संध्याजी। क्या मेत्रेई, गार्गी आदि विकसित नहीं थीं?
थीं।
संध्या जी : नारी विकास चाहे महत्वाकांक्षी भी हो मगर अपना स्वाभिमान और आत्सम्मान ना खोए। ऐसा मेरा मानना है।
भारद्वाज : यही तो हम कह रहे हैं। लेकिन संध्या जी ! ये आप भी मानेंगी कि स्त्री महत्वाकांक्षाओं के चलते बेबस हो जाती हैं और कमजोर कहूँ या कुछ और, घाघ उनकी बेबसी का नाजायज फाइदा ले बैठते हैं।
स्त्री-विमर्श

खोया बचपन

बच्चों का खो गया बचपन इस नंगी आधुनिकता में 
वरना सोलह से ऊपर तक बच्चे “बच्चे” बने रहते थे. 
अब वे न बच्चे ही रहे न ही हुए हैं पूर्णरूपेण व्यस्क
दिल तो है जवान मगर शरीर से वे अशक्त रहते हैं.

खोया बचपन

बच्चों का खो गया बचपन इस नंगी आधुनिकता में 

वरना सोलह से ऊपर तक बच्चे “बच्चे” बने रहते थे. 

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खोया बचपन

खोया बचपन

Source: खोया बचपन

बच्चों का खो गया बचपन इस नंगी आधुनिकता में
वरना सोलह से ऊपर तक बच्चे “बच्चे” बने रहते थे.
अब वे न बच्चे ही रहे न ही हुए हैं पूर्णरूपेण व्यस्क
दिल तो है जवान मगर शरीर से वे अशक्त रहते हैं.

खोया बचपन

दादीजी की मित्र चिड़ियायें या चिड़ियाओं की मित्र दादीजी?

उस दिन प्रात: हमें स्वपन आया जैसे दादीजी हमें पुकार रही हों, “अरे सोता ही रहेगा क्या? दादी से आखिरी बार नहीं मिलना क्या?”

खोया बचपन

Sparrowदादीजी रोज़ चिड़ियों को दाना डाला करती थीं. चिड़ियाएँ उनसे इतना घुल मिल गईं थीं कि उनको बाहर आते देख कर ही कोई उनके सिर पर बैठ चौंच मारे और कोई उनके कन्धों पर. दादी भी उनको खूब पुचकारती. जब अति हो जाती तो दादीजी गुस्सा भी करतीं. मगर चिड़ियाएँ कहाँ मानने वाली थी ?

जब हम बी.ए कर रहे थे तो दादीजी काफी बूढी हो चुकी थीं. आँखों पर चश्मा. हाथ में लाठी. झुक कर लाठी के सहारे चलना. मगर चिड़ियाओं को दाना डालना उनका भोजन करने से पहले व्रत समान था.

दादीजी बीमार हुईं. और फिर खाट से उतर ही न पाईं. उतरी तो उनकी निर्जीव देह और वो भी कुशा के बिछावन पर. शरीर पूरा हुआ करीब 4 बजे सुबह. उस दिन प्रात: हमें स्वपन आया जैसे दादीजी हमें पुकार रही हों, “अरे सोता ही रहेगा क्या? दादी से आखिरी बार नहीं मिलना क्या?”

हम हडबडा कर…

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दादीजी की मित्र चिड़ियायें या चिड़ियाओं की मित्र दादीजी?

दादीजी की मित्र चिड़ियायें या चिड़ियाओं की मित्र दादीजी?उस दिन प्रात: हमें स्वपन आया जैसे दादीजी हमें पुकार रही हों, “अरे सोता ही रहेगा क्या? दादी से आखिरी बार नहीं मिलना क्या?”

Source: दादीजी की मित्र चिड़ियायें या चिड़ियाओं की मित्र दादीजी?

दादीजी की मित्र चिड़ियायें या चिड़ियाओं की मित्र दादीजी?उस दिन प्रात: हमें स्वपन आया जैसे दादीजी हमें पुकार रही हों, “अरे सोता ही रहेगा क्या? दादी से आखिरी बार नहीं मिलना क्या?”

दादीजी की मित्र चिड़ियायें या चिड़ियाओं की मित्र दादीजी?

Sparrow
दादीजी रोज़ चिड़ियों को दाना डाला करती थीं. चिड़ियाएँ उनसे इतना घुल मिल गईं थीं कि उनको बाहर आते देख कर ही कोई उनके सिर पर बैठ चौंच मारे और कोई उनके कन्धों पर. दादी भी उनको खूब पुचकारती. जब अति हो जाती तो दादीजी गुस्सा भी करतीं. मगर चिड़ियाएँ कहाँ मानने वाली थी ?

जब हम बी.ए कर रहे थे तो दादीजी काफी बूढी हो चुकी थीं. आँखों पर चश्मा. हाथ में लाठी. झुक कर लाठी के सहारे चलना. मगर चिड़ियाओं को दाना डालना उनका भोजन करने से पहले व्रत समान था.

दादीजी बीमार हुईं. और फिर खाट से उतर ही न पाईं. उतरी तो उनकी निर्जीव देह और वो भी कुशा के बिछावन पर. शरीर पूरा हुआ करीब 4 बजे सुबह. उस दिन प्रात: हमें स्वपन आया जैसे दादीजी हमें पुकार रही हों, “अरे सोता ही रहेगा क्या? दादी से आखिरी बार नहीं मिलना क्या?”

हम हडबडा कर उठे. अपने कक्ष-साथी को जगाया और स्वपन के बारे में बताया. उसने हौंसला दिया और कहा, “दादी की उम्र बढ़ गई. फ़िक्र न कर.” मगर हम बेचैन ही रहे. उसी समय हमने साईकिल उठाई और चल पड़े गाँव की और जो करीब 20 किलोमीटर दूर था. हम पहुंचे करीब 6 बजे.

घर पहुंचे तो हम स्तब्ध. दाह संस्कार की तैयारियाँ चल रही थीं. बाहर चिड़ियाएँ शोर मच रही थीं. दाना डालने वाला पंछी तो उड़ चुका था. अब दाना कौन डाले ? वैसे भी सब गम में डूबे थे.

हमने दादीजी की डलिया उठाई और दाना डाल दिया. मगर ये क्या ? एक भी चिड़िया दाना नहीं उठा रही थी. इसके विपरीत वे सब मिलकर हमारे सिर में चौंच मारने लगीं.

खैर ! अर्थी तैयार हुई. उसे बाहर लाया गया. उस पर शव रखा जाने लगा तो चिड़ियाएँ होश-हवास खो बैठी. उनका शोर कान फोड़ने वाला था. हम सब (खास कर मैं) हैरान थे चिड़ियाओं के दादीजी के प्रति प्रेम को देख कर.

उसके बाद वे चिड़ियाएँ हमारे आँगन में कभी न उतरी.

दादीजी की मित्र चिड़ियायें या चिड़ियाओं की मित्र दादीजी?

जीवन क्या है?

आप जीवन को किस नज़रिए से देखते हो मित्रो? कुछ तो बोलो. जीवन तो आप भी जी रहे हो. आपको भी सीधा अनुभव है. तो अपनी भी सुनाओ ना ! मित्रों से क्या संकोच……

खोया बचपन

Jiwan 1

जीवन क्या है?
विलियम शेक्सपियर (William Shakespeare) ने कहा था कि जिंदगी एक रंगमंच है और हम लोग इस रंगमंच के कलाकार | सभी लोग जीवन (Life) को अपने- अपने नजरिये से देखते है| कोई कहता है जीवन एक खेल है (Life is a game), कोई कहता है जीवन ईश्वर का दिया हुआ उपहार है (Life is a gift), कोई कहता है जीवन एक यात्रा है (Life is a journey), कोई कहता है जीवन एक दौड़ है (Life is a race) और बहुत कुछ| और हम कहते हैं की जीवन ब्रह्म है जिसके बिना हम शव मात्र हैं………..

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जीवन क्या है?