स्त्री-विमर्श

हमारे आज के संदेश/फेसबुक पर टिप्पणी के संदर्भ में संध्या जी से रोचक वार्ता : साथियों से अनुरोध है कि इस सामयिक विषय पर अपने विचा अवश्य रखें और चर्चा को आगे बढ़ाएँ।
***************************************************************************
12074606_1056014951097157_342320594453256501_n
Good morning Friend. Women are the custodian of traditions. Women are losing vision fast. How will traditions survive?
प्रणाम मित्र। स्त्रियाँ परम्पराओं की संरक्षक हैं। वे आज अंतर्दृष्टि तेज़ी से खो रही हैं। परम्पराएँ जीवित रहेंगी कैसे?
Sun 9:21pm
संध्या जी : एक सफल पुरुष ही महिला की सफलता को हजम़ कर सकता है। महिलाओं को देश और घर की परम्परा के नाम पर ही तो आगे बढ़ने से रोका गया है।
क्या आधुनिक महिला पारंपरिक नहीँ हो सकती मान्यवर।
भारद्वाज : हो सकती है संध्या जी हो सकती है। हमारी माता जी सन ३० के आसपास की ८ पास थीं। उन दिनों स्त्रियाँ पढ़ी लिखी कहाँ होती थी? उन्होंने सभी परम्पराएँ निभाईं। कारण सिर्फ ये था कि वे अपना कर्तव्य समझती थीं। महत्वाकाक्षाएं ताक पर रख दी थीं या थी ही नहीं।
हम स्त्री-विरोधी नहीं हैं जैसा कि आप समझ बैठी हैं।
आज नारी स्वयं शोषण की शिकार बन रही है। आपको जान कर हैरानी होगी कि एक राष्ट्रपति भी एक जानी-मानी लेखिका का शारीरिक शोषण कर चुके हैं और ये उन लेखिका ने स्वयं उजागर किया है।
राजनीतिज्ञों को हवस पूरी करने के लिए और उद्योगपतियों को हवस और बाज़ार कि ज़रूरत पूरी करने के लिए रोज़ नई नारी चाहिए। और आज स्त्री अपनी महत्वाकांक्षाओं से बेबस उनकी आसानी से शिकार बन जाती हैं।
और यही कारण है कि परम्पराएँ ही क्या परिवार भी टूट रहे हैं।
अपने उद्गार रखने के लिए आप आगे आईं, अच्छा लगा।
संध्या जी : Bilkul sir
Aur me vikassheelta aur mahatvakanksha me antar samjhti hu
भारद्वाज : एक बात बताएं संध्याजी। क्या मेत्रेई, गार्गी आदि विकसित नहीं थीं?
थीं।
संध्या जी : नारी विकास चाहे महत्वाकांक्षी भी हो मगर अपना स्वाभिमान और आत्सम्मान ना खोए। ऐसा मेरा मानना है।
भारद्वाज : यही तो हम कह रहे हैं। लेकिन संध्या जी ! ये आप भी मानेंगी कि स्त्री महत्वाकांक्षाओं के चलते बेबस हो जाती हैं और कमजोर कहूँ या कुछ और, घाघ उनकी बेबसी का नाजायज फाइदा ले बैठते हैं।
Advertisements
स्त्री-विमर्श

राम राज्य

#रामराज्य #मर्यादापुरुषोत्तम #रघुकुल_रीत #वाल्मीक #तुलसीदास #दृढ़निश्चय 

सत्य पथ

!!!!!!!!!!!

राम राम पाठकगण. जिन श्री राम ने महलों को छोड़ वनों में विचरना स्वीकार किया, उनका महल बनाने के लिए उत्पात हो रहा है. राम मंदिर. अरे धूर्तो! राम के सपने पूरे करने हैं तो रामराज्य स्थापित कर के दिखाओ और राम-भक्तों का कुछ उपकार करो. राम के नाम पर खून न बहाओ.

ये संयोग था या श्रीराम की इच्छा कि दो महानुभावों ने रामायण रचना की एवं दोनों ही जीवन के पूर्वार्द्ध में वासनाओं में लिप्त थे. दोनों ही चोट खाकर सद्गुणी बने. एक को सप्तऋषियों ने आघात दिया दुसरे को पत्नी ने. अगर ध्यान से देखें तो रत्नाकर को चोट सिर्फ सप्तऋषियों ने ही नहीं दी बल्कि उसमें उनकी पत्नी का भी बड़ा योगदान था. पत्नी ने कहा था: आपका धर्म है हमारा पालन-पोषण. आप कैसे कमाते हो, हमें क्या? आप अपने कर्मों के लिए उत्तरदाई और हम अपने कर्मों के. रत्नाकर की आँखें फटी की फटी रह…

View original post 696 more words

राम राज्य

राम राज्य

!!!!!!!!!!!

राम राम पाठकगण. जिन श्री राम ने महलों को छोड़ वनों में विचरना स्वीकार किया, उनका महल बनाने के लिए उत्पात हो रहा है. राम मंदिर. अरे धूर्तो! राम के सपने पूरे करने हैं तो रामराज्य स्थापित कर के दिखाओ और राम-भक्तों का कुछ उपकार करो. राम के नाम पर खून न बहाओ.

ये संयोग था या श्रीराम की इच्छा कि दो महानुभावों ने रामायण रचना की एवं दोनों ही जीवन के पूर्वार्द्ध में वासनाओं में लिप्त थे. दोनों ही चोट खाकर सद्गुणी बने. एक को सप्तऋषियों ने आघात दिया दुसरे को पत्नी ने. अगर ध्यान से देखें तो रत्नाकर को चोट सिर्फ सप्तऋषियों ने ही नहीं दी बल्कि उसमें उनकी पत्नी का भी बड़ा योगदान था. पत्नी ने कहा था: आपका धर्म है हमारा पालन-पोषण. आप कैसे कमाते हो, हमें क्या? आप अपने कर्मों के लिए उत्तरदाई और हम अपने कर्मों के. रत्नाकर की आँखें फटी की फटी रह गईं. वाल्मिक जी और तुलसी जी के कायाकल्प में दोनों की पत्नियों का बड़ा योगदान है. दोनों के जीवन में अभूतपूर्व साम्यता हैइस सब को देखते हुए हमें तो लगता है तुलसीदासजी ही पूर्वजन्म में रत्नाकर थे जो बाद में आदिकवि वाल्मिक हुए और रामायण की रचना की. रामायण जनसाधारण के लिए क्लिष्ट और अगम्य थी, सो वाल्मिक जी ही तुलसी के रूप में पुन: प्रकट हुए रामचरितमानस की अभूतपूर्व रचना की.

राम छोटा सा नाम मगर सम्पुर्ण कायनात को अपने में समेटे हुए. स्मरण में आसान, मनन में आसान. उल्टा जपो या सुलटा, श्रेष्ठ परिणाम. वाल्मीकि जी उर्फ़ रत्नाकर उदाहरण हैं. सप्तऋषियों ने सलाह दी, “राम का नाम जपो.” रत्नाकर ठहरे डकैत. राम का नाम कभी लिया नहीं. सदैव मरने मारने की बात की थी या सुनी थी. अब राम का नाम जिव्हा पर आये तो आये कैसे? बड़ी उलझन हुई. बोले सप्तऋषियों से, “कभी राम नाम लिया नहीं. न ले सकता हूँ. सदैव मरना मारना सीखा है या सुना है. कोई और उपाय बताएं.” सप्तऋषियों ने गुत्थी सुलझा दी. कहा, ठीक है. आप “मरा….मरा” तो जप सकते हो? “मरा…मरा…” ही जपो.”

डकैत ठहरा दृढनिश्चयी. डकैतों से अधिक दृढनिश्चयी भला और कौन हो सकता है? क्षण क्षण मौत से लोहा लेने वाले; मगर क्या मजाल कि निश्चय से डिग जाएँ. निष्ठा के साथ शुरू हो गया, “मरा, मरा, मरा, मरा.” थोड़ी देर बाद ध्वनि स्वत: आने लगी “राम राम राम राम.” और हो गया रूपान्तरण. बन गए आदिकवि और रच डाला महाकाव्य, “रामायण.” राम ही बने महानायक. ऐसा महानायक जिसने कदम कदम पर मर्यादाओं का न केवल पालन किया बल्कि उनकी पुष्टि भी की.

राम मर्यादापुरुषोत्तम राम के नाम से ही अधिक जाने जाते हैं बजाय कि भगवान राम के. कारण स्पष्ट है. उन्होंने कदम कदम पर मर्यादाओं का पालन किया. पुत्र रूप में माता-पिता के प्रति. शिष्य के रूप में गुरु के प्रति. सखाभाव मित्रों के प्रति. कौन सा क्षेत्र है जहाँ राम ने मर्यादाओं का पालन न किया हो?

आलोचक राम में भी दोष ढूंढ लेते हैं. मगर वे उस तथाकथित दोष के गूढार्थ से वंचित रह जाते हैं. आलोचक कहते हैं सीताजी को पुन: वनवास देना स्त्री के प्रति अन्याय था. चलिए थोड़ी देर के लिए आलोचकों की ही मान लेते हैं. मगर उनसे एक प्रश्न करना तो हमारा भी हक़ है ना? हम उनसे पूछना चाहते हैं कि राज-काज संभालते हुए राजा राम ने प्रजा के प्रति जो वचन दिए थे, क्या वे पत्नि के कारण महत्त्वहीन हो सकते थे? मर्यादापुरुषोत्तम राम उन्हें कैसे भूल सकते थे? प्रजा में राज परिवार के एक सदस्य के प्रति भी संदेह संदेह-निवारण हेतु राजा का उत्तरदायित्व चौगुना बढ़ा देता है क्योंकि संदेह परिवार के सदस्य पर है; नहीं तो राजा अपनी प्रजा के प्रति मर्यादाहीन हो जायेगा. अपने परिवार का पक्ष लेने का आरोप लगेगा. इससे राजपरिवार की प्रतिष्ठा पर आंच आनी निश्चित है.

अत: राम ने पत्नि के वियोग को स्वीकार करना उचित समझा और सीताजी ने भी अपने पति के वचनों की मर्यादा की रक्षा की तथा पति-वियोग सहर्ष स्वीकार किया.

हम तो बल्कि ये कहेंगे कि रामायण या बाद में तुलसी रचित रामचरितमानस धार्मिक ग्रन्थ की बजाय सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक ग्रन्थ अधिक है. अगर हम सामाजिक और नैतिक सरोकारों का निष्ठापूर्वक पालन करते हैं तो हम आध्यात्म से वंचित कैसे रह सकते हैं?

सनातन धर्म जीवन को चार आश्रमों में विभाजित करता है. हर आश्रम के कुछ कर्तव्य हैं. प्रत्येक आश्रम के उन्हीं कर्तव्यों का पालन ही तो आध्यात्म है. और इसे रामचरितमानस से बढ़िया विधि कौन सा ग्रन्थ नई पीढ़ियों को सिखा / पढ़ा सकता है?इसके समकक्ष सिर्फ श्रीमदभगवद्गीता आती है. मगर श्रीमदभगवद्गीता को पढना समझना हर किसी के वश की बात नहीं. अत: रामचरितमानस सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ है क्योंकि ये आम बोलचाल में रचित है जिसे साक्षर व्यक्ति भी पढ़ और समझ सकता है.

और वचन निभाना कोई सीखे तो श्रीराम से. श्रीराम को लौटाने हेतु भरत जी अपनी माताओं, ससुर जनक और गुरुजी को साथ ले कर वन गए. गुरु की बात सर्वोपरि होती है. मगर श्रीराम ने किन मर्यादाओं के साथ गुरु, माताओं और भाई के आदेश या अनुरोध का मान रखा, वो मर्यादापुरुषोत्तम राम के वश की बात थी. इसी से लोकोक्ति भी बन गई: रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाएँ पर वचन न जाईं.”

राम राज्य

Wicked Versus Good

!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

A Saint Was Taking Bath In The River. He Saw A Scorpion Flowing In The Water Who Was Struggling To Save Himself. The Saint Took Pity And Took Him On His Palm. The Scorpion Stung Him. Saint’s Hand Writhed With Pain. The Insect Fell Into The River.

The Saint Saved Him Once Again. The Scorpion Stung Him As Earlier Causing His Fall Into The Water Once Again. The Saint Again Took Him On His Palm And Brought It Safe Out And Left Him On The Ground.

I Was Standing There. I Said, “Swamiji ! When The Scorpion Was Stinging You Time And Again, Why You Saved Him?” Swamiji Smiled And Said, “My Son! When The Scorpion Does Not Change His Nature Of Stinging, How Could I Leave My Of Saving?”

Wicked Versus Good

अहसानफरोश

भोगवाद में सब छिन्न भिन्न हो रहा है. परिवार टूट रहे हैं. सामाजिक तानाबाना दिन-प्रतिदिन क्षीण होता जा रहा है. बुज़ुर्ग उपेक्षित हैं. अधिकतर बुज़ुर्ग एकाकी जीवन जीने को मजबूर हैं. आने वाला समय बुजुर्गों के लिए और भी भयावह होने वाला है क्योंकि सरकार ने कर्मचारी-पेंशन योजना तक ख़त्म कर दी है………#बुढापा #संतान #अहसानफरोश_पुत्र #परिवार #कर्त्तव्य

सत्य पथ

!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

अहसानफरोश

***********

न जाने पुत्र

पिता की ऊँगली

पकड़े पकड़े

कब बड़ा हो जाता है?

और ऊँगली छोड़

कब और क्यों

अचानक बुढापे में

लरजते कंडों

डगमगाते कदमों को छोड़

दूर खड़ा हो जाता है?

वही पुत्र

माँ के स्तनपान करते करते,

कब सशक्त तन-बदन हो जाता है,

जवानी के जोश में,

झुर्रीदार चेहरे को

कम्पते क़दमों

सूखे स्तनों को छोड़

अन्य सुडौल और स्वस्थ

स्तनों में खो जाता है.

तत्पश्चात तो

उसका अता-पता तक न होता है

न मालुम कहाँ खो जाता है?

और बुढ़ापा मजबूर हो

आत्म-सम्मान की रक्षार्थ

फिर से उठ खड़ा होता है

अपना बोझ खुद उठाने को तत्पर हो जाता है

और बुढ़ापा

फिर से जवान हो जाता है.

<><><><><><><><><><><><><><><><><डॉ भारद्वाज क्षजान….

View original post

अहसानफरोश

अहसानफरोश

via अहसानफरोश

भोगवाद में सब छिन्न भिन्न हो रहा है. परिवार टूट रहे हैं. सामाजिक तानाबाना दिन-प्रतिदिन क्षीण होता जा रहा है. बुज़ुर्ग उपेक्षित हैं. अधिकतर बुज़ुर्ग एकाकी जीवन जीने को मजबूर हैं. आने वाला समय बुजुर्गों के लिए और भी भयावह होने वाला है क्योंकि सरकार ने कर्मचारी-पेंशन योजना तक ख़त्म कर दी है………#बुढापा #संतान #अहसानफरोश_पुत्र #परिवार #कर्त्तव्य

Quote