स्त्री-विमर्श

हमारे आज के संदेश/फेसबुक पर टिप्पणी के संदर्भ में संध्या जी से रोचक वार्ता : साथियों से अनुरोध है कि इस सामयिक विषय पर अपने विचा अवश्य रखें और चर्चा को आगे बढ़ाएँ।
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Good morning Friend. Women are the custodian of traditions. Women are losing vision fast. How will traditions survive?
प्रणाम मित्र। स्त्रियाँ परम्पराओं की संरक्षक हैं। वे आज अंतर्दृष्टि तेज़ी से खो रही हैं। परम्पराएँ जीवित रहेंगी कैसे?
Sun 9:21pm
संध्या जी : एक सफल पुरुष ही महिला की सफलता को हजम़ कर सकता है। महिलाओं को देश और घर की परम्परा के नाम पर ही तो आगे बढ़ने से रोका गया है।
क्या आधुनिक महिला पारंपरिक नहीँ हो सकती मान्यवर।
भारद्वाज : हो सकती है संध्या जी हो सकती है। हमारी माता जी सन ३० के आसपास की ८ पास थीं। उन दिनों स्त्रियाँ पढ़ी लिखी कहाँ होती थी? उन्होंने सभी परम्पराएँ निभाईं। कारण सिर्फ ये था कि वे अपना कर्तव्य समझती थीं। महत्वाकाक्षाएं ताक पर रख दी थीं या थी ही नहीं।
हम स्त्री-विरोधी नहीं हैं जैसा कि आप समझ बैठी हैं।
आज नारी स्वयं शोषण की शिकार बन रही है। आपको जान कर हैरानी होगी कि एक राष्ट्रपति भी एक जानी-मानी लेखिका का शारीरिक शोषण कर चुके हैं और ये उन लेखिका ने स्वयं उजागर किया है।
राजनीतिज्ञों को हवस पूरी करने के लिए और उद्योगपतियों को हवस और बाज़ार कि ज़रूरत पूरी करने के लिए रोज़ नई नारी चाहिए। और आज स्त्री अपनी महत्वाकांक्षाओं से बेबस उनकी आसानी से शिकार बन जाती हैं।
और यही कारण है कि परम्पराएँ ही क्या परिवार भी टूट रहे हैं।
अपने उद्गार रखने के लिए आप आगे आईं, अच्छा लगा।
संध्या जी : Bilkul sir
Aur me vikassheelta aur mahatvakanksha me antar samjhti hu
भारद्वाज : एक बात बताएं संध्याजी। क्या मेत्रेई, गार्गी आदि विकसित नहीं थीं?
थीं।
संध्या जी : नारी विकास चाहे महत्वाकांक्षी भी हो मगर अपना स्वाभिमान और आत्सम्मान ना खोए। ऐसा मेरा मानना है।
भारद्वाज : यही तो हम कह रहे हैं। लेकिन संध्या जी ! ये आप भी मानेंगी कि स्त्री महत्वाकांक्षाओं के चलते बेबस हो जाती हैं और कमजोर कहूँ या कुछ और, घाघ उनकी बेबसी का नाजायज फाइदा ले बैठते हैं।
स्त्री-विमर्श

On Women’s Day

After Making Universe

God Was More Nervous,

How To Create The World

Was His Problem Arduous.

After Giving Great Thought

He Came Up With A Creation,

Made The Prettiest Soul

That’s Now Called Woman.

Further Creation Made Him

More Perplexed And Worried,

He Can’t Be Everywhere

To Take Care Of His New Breed.

He Again Chose The Same

Prettiest Self-Made Creature,

And Gave This Responsibility

Suitable To Her Inborn Nature.

#Kshazan# #English #life #nature #love #inspiration #poetryofinstagram #InrernationalWomenDay

On Women’s Day

The Unsung Martyred Tawayafs

अगर मानसिकता गुलामी की है तो आपको स्वतन्त्रता कभी रास नहीं आयेगी।

#देखो

अंग्रेजों को नाकों चने चबवाने हेतु आज़ादी की दीवानी तवायफों ने अपने पैर के घुंघरू उतार कर फेंक दिए थे…

The Unsung Martyred Tawayafs

#चर्चिल_का_परिहास

चर्चिल
एटली

#चर्चिल_का_परिहास

द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था। एक व्यक्ति लंदन की सड़कों पर चिल्ला चिल्ला कर कह रहा था कि प्रधानमंत्री चर्चिल बेवकूफ है, मूर्ख है । पुलिस आई और उसे गिरफ़्तार कर ले गई ।

ब्रिटेिश पार्लियामेंट की बैठक चल रही थीI एक विपक्षी सदस्य ने यह मामला उठाते हुऐ कहा कि क्या देश में तानाशाही चल रही है कि एक नागरिक को मात्र पीएम को बेवकूफ और मूर्ख कहने पर पुलिस गिरफ़्तार कर लेती है । पीएम चर्चिल ने मुस्कुराते हुऐ जवाब दिया था कि उसे पीएम को अपशब्द कहने के कारण गिरफ़्तार नहीं किया गया है बल्कि युद्ध काल में एक राष्ट्रीय गोपनीयता को सार्वजनिक करने के कारण गिरफ़्तार किया गया है। इस पर सांसद ठहाका लगा कर हँस पड़े.

कहने की ज़रूरत नहीं है कि उस व्यक्ति को तत्काल रिहा कर दिया गया। कृपया इस प्रसंग को @goair की पायलट की बर्ख़ास्तगी से जोड़ने में अपना दिमाग़ न लगाये।!

#दूसरा_प्रकरण

प्रधान मंत्री एटली बहुत दुबले पतले थे. चर्चिल ने फब्ती कसी, “क्या सीकिया प्रधान मंत्री हैं? दुनियां सोचती होगी कि इंग्लैण्ड में अकाल पड़ा हुआ है.” सांसद ठठा कर हंस पड़े. जब सदन शांत हुआ तो एटली चुपचाप उठे और बोले, “जी महोदय! और उस अकाल का कारण हैं पूर्व प्रधान मंत्री चर्चिल.”

इस पर सांसद और चर्चिल खुद भी खूब हँसे क्योंकि चर्चिल बहुत मोटे थे औए खाते भी थे जम कर…….

#चर्चिल_का_परिहास

शाश्वत प्रेम

मेरी ज़िन्दगी की समग्र किताब हो तुम
ख्वाब ही भला क्यों? हकीकत हो तुम.
#प्रेम #स्नेह #आनंद

https://www.amazon.in/Saswat-Prem-Dr-K-S-Bhardwaj/dp/8194434262/ref=sr_1_9?dchild=1&keywords=Books+by+dr+ks+bhardwaj&qid=1607233025&s=books&sr=1-9


शाश्वत प्रेम

धर्म क्या है?

एक संजीदा मित्र ने पूछा है कि #धर्म_क्या_है?

अगर विश्वास हो तो सर्वप्रथम धर्म या कर्तव्य सनातन है. ये पश्चिम के दार्शनिक भी मान चुके है. सच बात तो यह है की सनातन कर्तव्य के रूप में था और आज भी है. वो कर्तव्य प्रकृति के प्रति था और है. इसीलिए सम्प्रदाय बनने के बाद भी प्रकृति की पूजा होती है.

प्रकृति का एक एक अंग पूजनीय था और है. उदाहरण: केला, आंवला, आम, नीम, पीपल अनेक पेड़ पौधे हैं जिनकी पूजा या कहिये संरक्षण (कर्तव्य) आज भी किया जाता है. सनातन में हर जीव में ईश्वर (जीव) माना गया है. इसी से कहावत बनीं कंकर कंकर में शंकर.

ये शंकर शिव भी हो सकते हैं और आत्मा भी. शंकर भी अमर हैं और आत्मा भी.

नाग की पूजा आज भी होती है. जितने भी पर्वत, नदियाँ, उनके उद्गम स्थल या शिखर: सब पूजनीय हैं.

ये भारतीय नहीं बल्कि वैश्विक विचार है. ग्रीक संस्कृति, पारसी संस्कृति में अग्नि और पर्वतों की पूजा आज भी होती है.

आज जितने भी धर्म बने हैं, वे सब सम्प्रदाय हैं. सम्प्रदाय का अर्थ है एक कोई विशष और निश्चित विचार.

उदाहरणस्वरूप सिख कौम को लीजिये. गुरु गोबिंद जी से पूर्व जितने भी गुरु हुए उन सब के नाम देव पर हैं. गुरुजी ने मुगलों के अत्याचार का मुकाबला करने हेतु सिक्खी जत्था बनाया था जो बाद में सिख सम्प्रदाय बन गया. क्यों बना? ये विवाद का विषय है.

नाम में सिंह उसके बाद अपनाया गया.

जैसे समाज में अनेक समुदाय होते हैं और हर समुदाय के कुछ रीति रिवाज़. वैसे ही आज इन सम्प्रदायों के अपने अपने विचार हैं और वे ही टकराव का कारण बनते हैं.

मुस्लिम और इसाई को लें. ये तो मुस्किल से 2000 वर्ष पुराने हैं. यानि ये भी सनातन हैं. जैसे सनातन में एक शक्ति है वैसे ही इनमें एक ईसा या मोहम्मद है.

सनातन में भी बाद में अनेक सम्प्रदाय बन गए. शैव और वैष्णव प्रमुख हैं.

यही हाल अन्य सम्प्रदायों का है. जैन श्वेताम्बर और दिगम्बर में बंट गए.

बौद्ध महायान और हीनयान में बदल गए. 

धर्म की परिभाषा : कर्तव्य ही धर्म हैं. कर्तव्य का पालन न करना ही अधर्म है. धर्म का खान-पान, वेश-भूषा, रहन-सहन से कोई ताल्लुक नहीं.

तटीय क्षेत्रों के निवासी मछली न खायेंगे तो क्या वे भूखे न मरेंगे? हैं वे भी सनातन क्योंकि आज प्रकृति के सच्चे रक्षक मछुवारे और आदिवासी ही हैं.

शेष तो बरबाद करने पर तुले हैं.

धर्म क्या है?

मित्रो जानते हो मुस्लिम सलवार क्यों पहनते है?

मित्रो जानते हो मुस्लिम सलवार क्यों पहनते है?

कुर्ते के साथ पायजामा पहना जाता है लेकिन पठानी कुर्ते और सलवार की जोड़ी क्यों है, कारण जानिए….

मेरे देशभक्त भाइयो !

मुस्लिमों के रोज रोज के झगड़ों और औरतों व बच्चों पर अत्याचारों से परेशान होकर महाराजा रणजीत सिंह के सेनापति हरी सिंह नलवा ने उनको उनकी औकात बताने के लिये अफगानिस्तान पर आक्रमण कर दिया।

मुस्लिमों को गाजर मूली की तरह काटा और अफगानिस्तान पर अधिकार कर लिया

हजारों मुस्लिमों को बंदी बनाकर एक बाड़े में रोक दिया गया और मुनादी करा दी कि कल इन सब को काट देंगे ताकि फिर ना रहेगा बांस ना बजेगी बांसुरी।

उनकी बीवियां आकर रोने लगीं । उनकी जान बख्शने की विनती करने लगी, हिन्दू धर्म का वास्ता देने लगी।

आखिर नारी जाति को रोते देख हरी सिंह नलवा जी का हृदय पसीज गया और उन्होंने कहा कि ठीक है कल आप बाड़े के सामने एक एक सलवार ले कर पहुँच जाना। जिसका पति सलवार पहनकर जायेगा उसे जाने दिया जायेगा।

अगले दिन जब सबको शर्त बता दी गयी तो 2 मुस्लिम बिना सलवार पहने बाड़े से बाहर निकले तलवार के वार से नरकगामी हो गए।

उनका ये हश्र देखकर सबने चुप चाप सलवार पहनी और अपनी औरतों के साथ कर निकल गए

इसके बाद सभी मुस्लिम पुरुषों को सलवार में रहने का आदेश जारी कर दिया गया।

हरी सिंह नलवा जी एकमात्र (अमेरिका और रूस भी नहीं ) ऐसे योद्धा थे जिन्होंने सालों अफगानिस्तान पर राज किया और वहां के मुस्लिमों को अपनी पत्नियों के साथ सलवार पहन के रहना पड़ा । ये अफगानियों असली औकात हो गई थी।

कई सालों तक जिन्दा रहने के लिए मजबूरन पहनी वो सलवार बाद में मुस्लिम समाज का हिस्सा बन गयी जिसे वो आज तक पहन रहे हैं।

सरदार हरीसिंह नलवा चरित्रवान योद्धा थे.

एक बार एक नौजवान स्त्री आई और बोली, “मुझे आप जैसा पुत्र चाहिए.”

नलवा जी ने कहा, “आप थोड़ी देर रुकें. आपकी इच्छा अवश्य पूर्ण की जायेगी.”

ये कह कर नलवा जी अपने कक्ष में गए. शाही वस्त्र बदले. साधारण वस्त्र पहने और बाहर आकर स्त्री के चरणों में शीश झुकाते हुए कहा, “माँ ! मैं तो आपकी कब से प्रतीक्षा कर रहा था?”

स्त्री स्तब्ध. तुरंत संयत होते हुए नलवा जी को कंधे से पकड़ कर उठाया, गले लगाया और कहा,”पुत्र! मैं तो धन्य हो गई. कभी सोचा न था कि मेरी मुराद क्षणों में पूरी हो जायेगी.”

दरअसल वो स्त्री नलवा जी से विवाह करने की इच्छुक थी.मगर जानती थी कि नलवा चरित्रवान हने के कारण विवाह न करेंगे. इस लिए उस स्त्री ने ये युक्ति सोची थी. मगर नलवा जी तो नलवा ठहरे. उन्होंने अपनी युक्ति निकाल ली और अपनी मर्यादा की रक्षा की तथा स्त्री की मुराद भी पूरी कर दी.

#प्रेम #स्नेह

मित्रो जानते हो मुस्लिम सलवार क्यों पहनते है?

छोटी सी घटना जिसने जीवन-दिशा बदल दी

पद्मभूषण से नवाजे गए हिंदी और उर्दू के सुप्रसिद्ध कहानीकार श्री कृष्णचन्द्र के बचपन की एक टीस जीवन भर उनके साथ रही जिसकी पीड़ा उनकी हर रचना में मिलेगी।

आम आदमी हेतु लिखने वाले कृष्णचन्द्र पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ अपने गुस्से की वजह उस एक घटना को बताते है जिसने उनकी चिंतन धारा की दिशा ही बदल डाली थी। उनके जीवन में कड़वाहट भरने वाली घटना यूँ है।

वे कहते हैं, “बचपन में एक बार मैं अपने पिताश्री के संग राजा बलदेवसिंह को देखने गया था जो बीमार थे। वहां मेरी मुलाकात दो राजकुमारों से हुई । उन्होंने मुझे अपने खिलौने दिखाए और मुझसे पूछा, “डॉक्टर के बेटे! तुम्हारे पास क्या है?”

झेंपते हुए मैंने कहा, “कुछ नहीं है।”

“उन्होंने मेरी जेब की तलाशी लेते हुए उसमें रखे सफ़ेद हत्थे वाला चाकू निकाल लिया। जब मैंने अपना चाक़ू मांगा तो राजकुमारों ने नहीं दिया।

मैंने उन्हें चांटा मार दिया। उन दोनों ने मुझे ख़ूब मारा। मेरे रोने की आवाज़ सुनकर मेरे पिताजी बाहर आये और मामला जानकर मुझे ही चांटा मारते हुए कहा, “नालायक! राजकुमारों पर हाथ उठाता है?”

वह चाकू वापस नहीं मिला।

मुझे बाद में मालूम हुआ कि ये रजवाड़े इसी तरह छीना-झपटी किया करते हैं। सफ़ेद हत्थी वाले चाकू प्रकरण ने मुझे समझाया कि किसी हसीन लड़की, उपजाऊ ज़मीन या कोई अन्य सुन्दर वस्तु देख कर ये यूँ ही मनमानी किया करते है और इसी तरह मनचाही चीज़ को हथिया लिया करते हैं। फिर वापस नहीं करते।

इसी तरह तो इनकी जागीरदारी चलती है। मगर अच्छा ही किया उन लोगों ने। दो आने के चाक़ू को छीन कर मेरी आँखें खोल दी । इस घटना ने मेरी सोच ही बदल डाली और पूँजीपति तथा सामन्तवाद सदा के लिए मेरे दुश्मन हो गए।

उन्होंने मुझे भी अपना दुश्मन बना लिया। पूँजीपति मेरी आँख की किरकिरी बन गए I वह सफ़ेद चाक़ू आज तक मेरे मन-मस्तिष्क को झंझोड़ रहा है और वही चाकू आज भी दिल में चुभ रहा है। मैंने जो कुछ लिखा वह उसी सफ़ेद चाकू से प्रेरित होकर लिखा है।

छोटी सी घटना जिसने जीवन-दिशा बदल दी

नितीशजी का भविष्य

नितीशजी का भविष्य

महाभारत-प्रसंग

महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था. युद्धभूमि में यत्र-तत्र योद्धाओं के फटे वस्त्र, मुकुट, टूटे शस्त्र, टूटे रथों के चक्के, छज्जे आदि बिखरे हुए थे और वायुमण्डल में पसरी हुई थी घोर उदासी!

गिद्ध, कुत्ते, सियारों की डरावनी आवाजों के बीच निर्जन हो चुकी उस भूमि पर द्वापर का सबसे महान योद्धा “देवव्रत” (भीष्म पितामह) शरशय्या पर पड़ा सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहा था — अकेला …. !

तभी उनके कानों में एक परिचित ध्वनि शहद घोलती हुई पहुँची, “प्रणाम पितामह…. !!”

भीष्म के सूख चुके अधरों पर एक मरी हुई मुस्कुराहट तैर उठी, बोले, “आओ देवकीनंदन …. ! स्वागत है तुम्हारा …. !! मैं बहुत देर से तुम्हारा ही स्मरण कर रहा था” …. !!

कृष्ण बोले, “क्या कहूँ पितामह ! अब तो यह भी नहीं पूछ सकता कि कैसे हैं आप?”

भीष्म चुप रहे, कुछ क्षण बाद बोले, “पुत्र युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करा चुके केशव … ? उनका ध्यान रखना , परिवार के बुजुर्गों से रिक्त हो चुके राजप्रासाद में उन्हें अब सबसे अधिक तुम्हारी ही आवश्यकता है.”

कृष्ण चुप रहे …. !

भीष्म ने पुनः कहा, “कुछ पूछूँ केशव …. ? बड़े अच्छे समय से आये हो …. ! सम्भवतः धरा छोड़ने के पूर्व मेरे अनेक भ्रम समाप्त हो जाँय ” …. !!

कृष्ण बोले – “कहिये न पितामह ….!”

“एक बात बताओ प्रभु ! तुम तो ईश्वर हो न …. ?”

कृष्ण ने बीच में ही टोका , “नहीं पितामह ! मैं ईश्वर नहीं … मैं तो आपका पौत्र हूँ पितामह … ईश्वर नहीं ….”

भीष्म उस घोर पीड़ा में भी ठठा कर हँस पड़े …. ! बोले, “अपने जीवन का स्वयं कभी आकलन नहीं कर पाया कृष्ण, सो नहीं जानता कि अच्छा रहा या बुरा, पर अब तो इस धरा से जा रहा हूँ कन्हैया, अब तो ठगना छोड़ दे रे …. !!”

कृष्ण न जानें क्यों भीष्म के पास सरक आये और उनका हाथ पकड़ कर बोले …. “कहिये पितामह …. !”

भीष्म बोले, “एक बात बताओ कन्हैया ! इस युद्ध में जो हुआ वो ठीक था क्या …. ?”

“किसकी ओर से पितामह …. ? पांडवों की ओर से …. ?”

” कौरवों के कृत्यों पर चर्चा का तो अब कोई अर्थ ही नहीं कन्हैया! पर क्या पांडवों की ओर से जो हुआ वो सही था ….? आचार्य द्रोण का वध, दुर्योधन की जंघा के नीचे प्रहार, दुःशासन की छाती का चीरा जाना, जयद्रथ के साथ हुआ छल, निहत्थे कर्ण का वध, सब ठीक था क्या …. ? यह सब उचित था क्या …. ?”

“इसका उत्तर मैं कैसे दे सकता हूँ पितामह …. ? इसका उत्तर तो उन्हें देना चाहिए जिन्होंने यह किया ….. !! उत्तर दें दुर्योधन का वध करने वाले भीम, उत्तर दें कर्ण और जयद्रथ का वध करने वाले अर्जुन …. !! मैं तो इस युद्ध में कहीं था ही नहीं पितामह …. !!”

“अभी भी छलना नहीं छोड़ोगे कृष्ण …. ? अरे विश्व भले कहता रहे कि महाभारत को अर्जुन और भीम ने जीता है, परानु मैं जानता हूँ कन्हैया कि यह तुम्हारी और केवल तुम्हारी विजय है! मैं तो उत्तर तुम्ही से पूछूंगा कृष्ण …. !”

“तो सुनिए पितामह …. ! कुछ बुरा नहीं हुआ , कुछ अनैतिक नहीं हुआ …. ! वही हुआ जो हो होना चाहिए …. !”

“यह तुम कह रहे हो केशव …. ?”

मर्यादा पुरुषोत्तम राम का अवतार कृष्ण कह रहा है….? यह छल तो किसी युग में हमारे सनातन संस्कारों का अंग नहीं रहा, फिर यह उचित कैसे गया ….. ?”

“इतिहास से शिक्षा ली जाती है पितामह, पर निर्णय वर्तमान की परिस्थितियों के आधार पर लेना पड़ता है …. ! हर युग अपने तर्कों और अपनी आवश्यकता के आधार पर अपना नायक चुनता है …. !! राम त्रेता युग के नायक थे, मेरे भाग में द्वापर आया है…. ! हम दोनों का निर्णय एक सा नहीं हो सकता पितामह …. !!”

” नहीं समझ पाया कृष्ण ! तनिक समझाओ तो …. !”

“राम और कृष्ण की परिस्थितियों में बहुत अंतर है पितामह …. ! राम के युग में रावण जैसा खलनायक भी शिवभक्त होता था …. !! तब रावण जैसी नकारात्मक शक्ति के परिवार में भी विभीषण जैसे सन्त हुआ करते थे ….. ! तब बाली जैसे खलनायक के परिवार में भी तारा जैसी विदुषी स्त्रियाँ और अंगद जैसे सज्जन पुत्र होते थे…. ! उस युग में खलनायक भी धर्म का ज्ञान रखता था …. !! इसलिए राम ने उनके साथ कहीं छल नहीं किया…. ! किंतु मेरे भाग में कंस, जरासन्ध, दुर्योधन, दुःशासन, शकुनी, जयद्रथ जैसे घोर पापी आये हैं …. !! उनकी समाप्ति के लिए हर छल उचित है पितामह …. ! पाप का अंत आवश्यक है पितामह, वह चाहे जिस विधि से हो …. !!”

“तो क्या तुम्हारे इन निर्णयों से गलत परम्पराएं नहीं प्रारम्भ होंगी केशव …. ? क्या भविष्य तुम्हारे इन छलों का अनुशरण नहीं करेगा …. ? और यदि करेगा तो क्या यह उचित होगा ….. ??”

“भविष्य तो इससे भी अधिक नकारात्मक आ रहा है पितामह …. ! कलियुग में तो इतने से भी काम नहीं चलेगा …. ! वहाँ मनुष्य को कृष्ण से भी अधिक कठोर होना होगा …. नहीं तो धर्म समाप्त हो जाएगा …. ! जब क्रूर और अनैतिक शक्तियाँ सत्य एवं धर्म का समूल नाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों तो नैतिकता अर्थहीन हो जाती है पितामह …. ! तब महत्वपूर्ण होती है विजय, केवल विजय …. ! भविष्य को यह सीखना ही होगा पितामह ….. !!”

“क्या धर्म का भी नाश हो सकता है केशव …. ? और यदि धर्म का नाश होना ही है तो क्या मनुष्य इसे रोक सकता है ….. ?”

“सबकुछ ईश्वर के भरोसे छोड़ कर बैठना मूर्खता होती है पितामह …. ! ईश्वर स्वयं कुछ नहीं करता ….. ! ईश्वर तो केवल मार्ग दर्शन करता है. सब मनुष्य को ही स्वयं करना पड़ता है …. !आप मुझे भी ईश्वर कहते हैं न …. ! तो बताइए न पितामह! मैंने स्वयं इस युद्घ में कुछ किया क्या ….. ? सब पांडवों को ही करना पड़ा न …. ? यही प्रकृति का संविधान है …. ! युद्ध के प्रथम दिन यही तो कहा था मैंने अर्जुन से …. ! यही परम सत्य है ….. !!”

भीष्म अब सन्तुष्ट लग रहे थे …. !

उनकी आँखें धीरे-धीरे बन्द होने लगीं थी …. !

उन्होंने कहा, “चलो कृष्ण ! यह इस धरा पर अंतिम रात्रि है …. कल सम्भवतः चले जाना हो … अपने इस अभागे भक्त पर कृपा करना कृष्ण …. !”

कृष्ण ने मन मे ही कुछ कहा और भीष्म को प्रणाम कर लौट चले परन्तु युद्धभूमि के उस डरावने अंधकार में भविष्य को जीवन का सबसे बड़ा सूत्र मिल चुका था…. !

“जब अनैतिक और क्रूर शक्तियाँ सत्य और धर्म का विनाश करने के लिए आक्रमण कर रही हों तो नैतिकता का पाठ आत्मघाती होता है ….।।”

धर्मों रक्षति रक्षितः

महाभारत-प्रसंग